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Supreme Court: कूड़ा प्रबंधन पर राज्यों से जवाब तलब; केंद्र को जाति प्रमाणपत्र में नाम बदलाव पर अहम निर्देश

Mon, 24 Feb 2025 11:15 PM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने कूड़ा प्रबंधन को लेकर एनसीआर के राज्यों से जवाब तलब किया है। अदालत ने सोमवार को कहा कि कचरे को स्रोत पर ही अलग-अलग करना पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण है। आइए पढ़ते हैं सुप्रीम कोर्ट की अहम खबरें...। 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने कूड़ा प्रबंधन को लेकर एनसीआर के राज्यों से जवाब तलब किया है। अदालत ने सोमवार को कहा कि कचरे को स्रोत पर ही अलग-अलग करना पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण है। जस्टिस अभय एस ओका और उज्जवल भुइयां की पीठ ने कहा कि ठोस कूड़ा प्रबंधन 2016 के नियमों का पालन न होने से देश के कई शहर प्रभावित हो रहे हैं। 

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पीठ ने कहा कि हम देख रहे हैं स्मार्ट सिटी परियोजनाओं का काम तेजी से चल रहा है, लेकिन ठोस कूड़ा प्रबंधन नियमों का पालन किए बिना शहरों को स्मार्ट कैसे बनाया जा सकता है? कोर्ट ने एनसीआर में आने वाले राज्य दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान से कूड़ा प्रबंधन नियमों का पालन न करने पप जवाब मांगा।

कोर्ट ने कहा कि अगर कूड़े को सही तरीके से अलग नहीं किया जाएगा, तो कूड़े से बिजली बनाने वाली परियोजनाएं अधिक प्रदूषण पैदा करेंगीं। प्रदूषण मामले को लेकर वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने एनसीआर में ठोस कूड़ा प्रबंधन में कचरे को अलग-अलग न किए जाने पर चिंता जताई। 
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इस पीठ ने कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ता का कहना सही है कि कूड़े को स्रोत पर ही अलग-अलग कर देना पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने एनसीआर के सभी राज्यों को ठोस कूड़ा प्रबंधन नियम 2016 के तहत मार्च के अंत तक हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा।  पीठ ने कहा कि राज्य समयसीमा को ध्यान में रखते हुए कार्यदायी संस्थाओं के साथ मिलकर योजना तैयार करें। हलफनामे में एनसीआर की सभी शहरी निकायो के प्रयासों की भी जानकारी दी जाए। अधिकारी ठोस कचरा प्रबंधन के लिए सभी उचित उपाय और अभियान चलाएं।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से भी मांगी रिपोर्ट
कोर्ट ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से कचरे से बिजली बनाने वाली परियोजनाओं के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर भी जानकारी मांगी है। कोर्ट ने कहा कि रोज उत्पन्न होने वाले ठोस कूड़े से निपटने के लिए कोई कदम नहीं उठाया जाता है तो हम निर्माण गतिविधियों पर रोक लगाने को मजबूर होंगे।  दिल्ली सरकार और नगर निगम ने 2016 के नियमों के पालन के लिए कुछ नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि यह एक बड़ी समस्या है कि दिल्ली में रोज 3000 टन कूड़ा बिना प्रबंधित हुए रह जाता है। यह आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। 

व्यक्ति की स्वतंत्रता बहुमूल्य अधिकार : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के तहत व्यक्ति की स्वतंत्रता एक बहुमूल्य अधिकार है। अदालतों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि ऐसी स्वतंत्रता में हल्के से हस्तक्षेप न किया जाए।जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के 3 जनवरी के आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी। हाईकोर्ट ने हत्या के प्रयास के मामले में एक आरोपी जमानत खारिज कर दी थी। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के पास जमानत रद्द करने का कोई वैध कारण नहीं था। प्रथम दृष्टया भी कोई ऐसी सामग्री नहीं थी, जो दर्शाती हो कि जमानत दिए जाने के बाद अपीलकर्ता का आचरण ऐसा था कि उसकी जमानत रद्द की जाए।

पीठ ने कहा कि गवाहों को प्रभावित करने, उन्हें धमकाने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने का कोई आरोप नहीं है। इस बात को दर्शाने वाली कोई भी सामग्री मौजूद नहीं है कि मुकदमे को टालने के लिए विलंबकारी रणनीति अपनाई गई है। हाईकोर्ट ने किसी भी ऐसे कृत्य का उल्लेख नहीं किया है जिससे यह राय बने की अपीलकर्ता की ओर से जमानत की किसी शर्त का उल्लंघन किया गया है और इसलिए उसकी जमानत रद्द करना जरूरी है।

जाति प्रमाणपत्रों में नाम में बदलाव पर विचार करे केंद्र
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा कि वह जाति प्रमाणपत्रों में कुछ शब्दों के इस्तेमाल से बचने के लिए अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग के लोगों के अधिकारों को बरकरार रखते हुए नामकरण में बदलाव पर विचार करे। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सोमवार को मामले में सुनवाई करते हुए इस बात पर सहमति जताई कि इस मुद्दे पर संसद को निर्णय लेना है। लेकिन कहा कि नामकरण में बदलाव से लोगों को उनकी जाति के नाम से पहचाने जाने से रोकने में काफी मदद मिलेगी।

पीठ ने कहा, हमारा देश 1950 से 2025 तक एक लंबी यात्रा तय कर चुका है। अब, 2025 में इन शब्दों और अभिव्यक्तियों का उपयोग करना उचित नहीं है। यह पूरी तरह से विधायी मुद्दा है और हमने केंद्र को इस मुद्दे के बारे में संवेदनशील बनाने के लिए नोटिस जारी किया है। आप इन व्यक्तियों के चरित्र को बदले बिना नामकरण में बदलाव कर सकते हैं। हिंदी में बहुत समृद्ध शब्दावली है। आप इन शब्दों के अलावा कुछ भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

केंद्र की तरफ से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केके नटराजन ने कहा कि यह नीतिगत मामला है और कुछ शब्दों को हटाने से एससी और एसटी वर्ग के लोगों के अधिकारियों और उन्हें मिल रही सुविधाओं पर असर पड़ सकता है। इस पर पीठ ने कहा कि कोई भी शब्दों को हटाना नहीं चाहता, सिर्फ उनके नाम में बदलाव चाहता है और कोर्ट चाहता है कि संसद इस मुद्दे पर संज्ञान ले। इस मामले में अब छह सप्ताह बाद सुनवाई होगी।

एचआईवी दवा की खरीद गुणवत्ता पर केंद्र व राज्यों से जवाब तलब
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से देश में एचआईवी रोगियों के इलाज के लिए एंटी-रेट्रोवायरल थेरेपी दवाओं की गुणवत्ता और खरीद पर जवाब दाखिल करने को कहा है। जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) और अन्य की तरफ से 2022 में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए जवाब तलब किया। याचिका में एंटी-रेट्रोवायरल (एआरवी) थेरेपी दवाओं की आपूर्ति और गुणवत्ता को लेकर चिंता जताई गई है। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने कहा कि अब तक केवल चार राज्यों ने उनकी तरफ से दायर हलफनामे पर अपने जवाब पेश किए हैं, जिसमें दवाओं की खरीद प्रक्रिया और गुणवत्ता सहित कुछ मुद्दों पर प्रकाश डाला गया है। इस पर पीठ ने कहा कि केंद्र और सभी राज्य एक महीने के भीतर अपना जवाब दाखिल करें। साथ ही मामले की सुनवाई 4 अप्रैल को तय कर दी।

मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से केंद्रीय मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण, राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण और मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा बोर्ड की स्थापना और उसकी कार्यप्रणाली के बारे में जानकारी देने का निर्देश दिया है। 7 फरवरी को सुनवाई के दौरान जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस पीके मिश्रा की पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी को इस मामले में 21 मार्च तक एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा कि हलफनामे में प्राधिकरण व समीक्षा बोर्ड में वैधानिक और अनिवार्य नियुक्तियों का भी जिक्र होना चाहिए। अधिवक्ता गौरव कुमार बंसल ने शीर्ष अदालत में दाखिल अपनी याचिका में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की आवश्यकता वाले व्यक्तियों के लिए दिशा-निर्देश जारी करने का अनुरोध किया है। साल 2018 में दाखिल अपनी याचिका में बंसल ने आरोप लगाया था कि उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के एक आश्रय गृह में मानसिक बीमारियों से जूझ रहे व्यक्तियों को जंजीरों से बांधकर रखा गया था, जो मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के प्रावधानों का उल्लंघन है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मानसिक बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को जंजीर से बांधने की इजाजत नहीं दी जा सकती। अदालत ने ऐसे कृत्यों को नृशंस, अमानवीय और संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत गारंटीकृत जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन करार दिया था।

दुष्कर्म मामले में आरोपी भाजपा नेता को नहीं मिली अग्रिम जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भाजपा नेता सुनील सोरेन की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। उन पर एक महिला से दुष्कर्म का आरोप है। जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने टिप्पणी की कि सोरेन के खिलाफ मामला 2022 से लंबित है और वह गिरफ्तारी से बच नहीं सकते। पीठ ने कहा, आपको अदालती कार्यवाही का सम्मान करना होगा। पीठ ने यह भी कहा कि झारखंड हाईकोर्ट ने सोरेन को 3 बार अग्रिम जमानत देने से इन्कार कर दिया था। वर्ष 2017 से लंबित शिकायत मामले में आरोप लगाया गया है कि सोरेन ने महिला का यौन शोषण किया जिसने बाद में एक बच्चे को जन्म दिया। शिकायतकर्ता के मुताबिक, भाजपा नेता ने उससे शादी करने का वादा किया था, लेकिन ऐसा नहीं किया और यौन शोषण जारी रखा।

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दूसरे देशों के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी नहीं कर सकता कोर्ट

 सुप्रीम कोर्ट ने उस जनहित याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया, जिसमें बांग्लादेश में जारी हिंसा के बीच हिंदुओं व अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की मांग की गई थी। सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने कहा, यह मामला विदेशी मामलों से संबंधित है और न्यायालय किसी अन्य देश के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी नहीं कर सकता है। उपरोक्त बातों को नोट करने के बाद, याचिकाकर्ता ने याचिका वापस ले ली और मामला खारिज कर दिया गया।

याचिका लुधियाना स्थित व्यवसायी और इस्कॉन मंदिर संचालन बोर्ड के उपाध्यक्ष राजेश ढांडा ने दायर की थी। याचिका में बांग्लादेश में हिंसा से हिंदुओं की सुरक्षा के अलावा, हिंसा के बाद भारत में प्रवेश करने वाले हिंदुओं के लिए नागरिकता के आवेदन पर विचार करने की समयसीमा बढ़ाने की भी मांग की गई है। याचिका में बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचार, उत्पीड़न और अन्य अपराधों को रोकने के लिए शीर्ष अदालत से मांग की गई थी कि केंद्र सरकार को न्याय के हित में अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुसार तत्काल राजनयिक या अन्य कदम उठाने का निर्देश दिया जाए।  

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