उपासना स्थल कानून पर नई याचिकाओं से सुप्रीम कोर्ट नाराज
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पूर्व सैन्य अधिकारी के खिलाफ दुष्कर्म मामले में दाखिल की गई चार्जशीट को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने सेवानिवृत्त कैप्टन राकेश वालिया को राहत दी। कोर्ट ने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपपत्र को खारिज न करके गलती की।
पूर्व सैन्य अधिकारी के वकील अश्विनी दुबे ने कहा कि शिकायतकर्ता की गवाही से पता चलता है कि कोई अपराध नहीं हुआ था और एफआईआर रद्द की जानी चाहिए। महिला यौन उत्पीड़न के झूठे आरोप लगाकर उगाही की धमकी देने वाला रैकेट चलाती थी। उसने पिछले आठ वर्षों में याचिकाकर्ता सहित नौ अलग-अलग लोगों के खिलाफ सात अलग-अलग पुलिस थानों में सात एफआईआर दर्ज की गईं।
उच्च न्यायालय ने 31 जुलाई 2024 को अपने आदेश में कहा था कि मामला ट्रायल कोर्ट के समक्ष है, जो याचिकाकर्ता की ओर से दी गई दलीलों पर विचार करेगा और उचित फैसला सुनाएगा।
याचिका में कहा गया कि पूर्व सैन्य अधिकारी कानून के बेईमान दुरुपयोगकर्ता ने शिकार बनाया। 2019 और 2020 के बीच कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान महिला ने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर होने का दावा करते हुए पूर्व सैन्य अधिकारी से संपर्क किया था कि वह उनकी पुस्तक ब्रोकन क्रेयॉन्स कैन स्टिल कलर का प्रचार करेगी। 29 दिसंबर 2021 को सैन्य अधिकारी ने अपनी आत्मकथा के प्रचार के तरीके पर चर्चा करने के लिए शिकायतकर्ता से छतरपुर मेट्रो स्टेशन पर मुलाकात की। इसके बाद वह उसे नोएडा छोड़कर आए। शाम करीब छह बजे स्थानीय पुलिस से उसे फोन आया, जिसमें महिला की शिकायत के बारे में बताया गया कि उसने उसे नशीला पदार्थ दिया और उसका यौन उत्पीड़न किया गया।
सुप्रीम कोर्ट
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सजा पूरी होने के बाद भी कैदी को रिहा न करने पर दिल्ली सरकार से जवाब-तलब
सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में नीतीश कटारा की हत्याकांड में 20 साल की जेल की सजा काट रहे सुखदेव यादव उर्फ पहलवान को सजा पूरी हो जाने के बाद ही रिहा न किए जाने पर दिल्ली सरकार से जवाब तलब किया है। न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने दिल्ली सरकार के गृह विभाग के सचिव को हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया। पीठ ने दिल्ली सरकार के वकील से पूछा कि हमारा सवाल यह है कि क्या आपका मामला यह है कि 20 साल की वास्तविक कैद पूरी होने के बाद भी राज्य याचिकाकर्ता को रिहा नहीं करेगा?
इस पर वकील ने कहा कि यादव को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय ने छह फरवरी 2015 को दिए अपने फैसले में यादव को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जो कि छूट पर विचार किए बिना वास्तविक कारावास के 20 वर्ष के बराबर होगी और उस पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया था। पीठ को बताया गया कि यादव जल्द ही अपनी 20 वर्ष की वास्तविक सजा पूरी कर लेंगे। पीठ ने दिल्ली सरकार के वकील से पूछा कि क्या कोई राज्य अदालतों के फैसलों को इस तरह पढ़ेगा। पीठ ने गृह विभाग के सचिव को 28 फरवरी तक हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया। दस पर 3 मार्च को सुनवाई होगी।
यादव की याचिका में दिल्ली हाईकोर्ट के नवंबर 2024 के आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें उन्हें तीन सप्ताह के लिए छुट्टी पर रिहा करने की उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी। तीन अक्तूबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने कटारा के सनसनीखेज अपहरण और हत्या में उनकी भूमिका के लिए विकास यादव और उसके चचेरे भाई विशाल को बिना किसी छूट के 25 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी। मामले में सह-दोषी सुखदेव यादव उर्फ पहलवान को 20 वर्ष की जेल की सजा सुनाई गई।
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दिल्ली पुलिस आयुक्त के पद पर राकेश अस्थाना की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई बंद
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 2021 में आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना को दिल्ली पुलिस आयुक्त नियुक्ति किए जाने के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई को बंद कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि चूंकि अस्थाना अब पद से सेवानिवृत हो चुके हैं, ऐसे में उनकी नियुक्ति को चुनौती देने वाली यह याचिका निरर्थक हो गई है। हालांकि, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस कानूनी प्रश्न को खुला छोड़ दिया कि क्या राज्यों के पुलिस महानिदेशकों की नियुक्ति पर शीर्ष अदालत द्वारा पहले जारी दिशानिर्देश दिल्ली के पुलिस आयुक्त के चयन पर लागू होंगे। सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन की याचिका का निपटारा करते हुए जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, यदि भविष्य में उसे ऐसे किसी मामले का पता चलता है, जिसमें ऐसी नियुक्तियों में अनियमितता पाई जाती है, तो वह इसका न्यायिक संज्ञान लेगा। उन्होंने कहा कि फिलहाल इस मुद्दे पर हम किसी तरह का कोई आदेश पारित नहीं कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा, हमें उम्मीद है कि भविष्य में पुलिस आयुक्त की नियुक्ति में नियमों और शीर्ष अदालत द्वारा तय मानदंडों की अनदेखी नहीं की जाएगी। साथ ही कहा कि यदि ऐसा होता है, तो हम इसका संज्ञान लेंगे। अगर हम अभी ऐसा करते हैं, तो यह कई सम्मानित अधिकारियों के लिए अनावश्यक रूप से समस्याएं पैदा करेगा। सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने 2021 में दिल्ली पुलिस आयुक्त के पद पर राकेश अस्थाना की नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
भ्रष्टाचार मामले में पूर्व सीएम कुमारस्वामी की याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी की भ्रष्टाचार मामले में कार्यवाही रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस राजेश बिंदल की पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट के 9 अक्तूबर, 2020 के आदेश के खिलाफ कुमारस्वामी की याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया। हाईकोर्ट ने मामले में उनके खिलाफ कार्यवाही रद्द करने से इन्कार कर दिया था। वरिष्ठ अधिवक्ता हरिन रावल और अतिरिक्त महाधिवक्ता अमन पंवार कर्नाटक राज्य की ओर से पेश हुए और उन्होंने शीर्ष अदालत में कुमारस्वामी की याचिका का विरोध किया। यह मामला एम एस महादेव स्वामी की ओर से बंगलूरू में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत विशेष न्यायाधीश के समक्ष दायर एक निजी शिकायत से संबंधित है। इसमें कुमारस्वामी और अन्य के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग की गई है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि जून 2006 से अक्तूबर 2007 के बीच कुमारस्वामी के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल के दौरान बंगलूरू दक्षिण तालुक के उत्तरहल्ली होबी के हलगेवदेरहल्ली गांव में दो भूखंडों की अधिसूचना रद्द कर दी गई थी, ताकि आर्थिक लाभ कमाया जा सके।
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया, घुसपैठियों के निर्वासन की प्रक्रिया पर मंथन जारी
असम से घुसपैठियों को देश से बाहर भेजने की प्रक्रिया उच्चतम कार्यकारी स्तर पर विचाराधीन है। केंद्र सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी दी। जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ के समक्ष सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि असम से चिह्नित घुसपैठियों को देश से बाहर भेजने का निर्णय 21 मार्च तक लिया जा सकता है। मेहता ने इस मामले में कोर्ट से कुछ और समय देने की मांग की, जिसे अदालत ने मान लिया। इस मामले की अगली सुनवाई 21 मार्च को होगी।
दरअसल घुसपैठिया घोषित करने के बावजूद उन्हें हिरासत केंद्रों में रखने और निर्वासित नहीं करने पर सुप्रीम कोर्ट ने 4 फरवरी को असम सरकार की खिंचाई करते हुए कहा कि वह किस मुहूरत का इंतजार कर रही है। शीर्ष अदालत ने कहा कि असम सरकार तथ्यों को दबा रही है। साथ ही कहा कि एक बार जब उनकी पहचान हो गई तो उन्हें तत्काल देश से बाहर करना चाहिए। शीर्ष अदालत ने असम सरकार की उस दलील पर भी हैरानी जताई थी कि हिरासत में रखे गए लोगों के देश और पते की जानकारी नहीं होने के कारण उसने विदेश मंत्रालय को उनकी राष्ट्रीयता सत्यापन के फॉर्म नहीं भेजे। शीर्ष अदालत ने उसे त्रुटिपूर्ण हलफनामा बताते हुए असम सरकार की खिंचाई की थी। हलफनामे में असम ने 270 विदेशियों को मटिया ट्रांजिट कैंप में हिरासत में रखने का कोई निर्धारित कारण नहीं बता पाया था। शीर्ष अदालत ने असम विधि सेवा प्राधिकरण को उस कैंप का औचक निरीक्षण कर उस केंद्र की स्वच्छता और खाने की गुणवत्ता की जांच करने का निर्देश दिया था।
यूनियन कार्बाइड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, जहरीले कचरे को जलाने के लिए क्या हैं सुरक्षा इंतजाम
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मध्य प्रदेश अथॉरिटी को धार जिले के पीथमपुर क्षेत्र में 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के खतरनाक अपशिष्ट के निपटान के संबंध में बरती गई सावधानियों के बारे में अवगत कराने के लिए कहा है। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह टिप्पणी तब की जब अपशिष्ट के निपटान से संबंधित एक याचिका को तत्काल सुनवाई के लिए उसके समक्ष लाया गया।
शीर्ष अदालत ने 17 फरवरी को केंद्र, मध्य प्रदेश सरकार और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से उस याचिका पर जवाब मांगा था, जिसमें निपटान स्थल से एक किलोमीटर के दायरे में स्थित ग्रामीणों के जीवन और स्वास्थ्य को इससे होने वाले कथित खतरे का मुद्दा उठाया गया था। मामले को तत्काल सूचीबद्ध करने का अनुरोध करते हुए याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 18 फरवरी को राज्य सरकार को 27 फरवरी से कचरे के निपटान का परीक्षण करने की अनुमति दी थी। उन्होंने पीठ से आग्रह किया कि इस मामले पर 27 फरवरी को शीर्ष अदालत में सुनवाई की जाए। इसी दिन पहले चरण के तहत जहरीले कचरे को जलाया जाना है।
पीठ ने कहा, 27 फरवरी को याचिका पर सबसे पहले सुनवाई होगी। जब तक आशंकाएं ठोस नहीं पाई जातीं, तब तक हम इसे रोकने नहीं जा रहे हैं। अथॉरिटी को याचिका का अध्ययन करना चाहिए और पता लगाना चाहिए कि याचिकाकर्ता की ओर से जताई गई चिंताओं में कोई दम है या नहीं। अगर याचिका में जताई गई चिंताओं में कोई दम है, तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि अथॉरिटी की ओर से क्या कदम उठाए जा रहे हैं। पीठ ने सवाल किया कि क्या आपने सभी सावधानियां बरती हैं? पीठ ने यह भी कहा कि आमतौर पर अगर सुप्रीम कोर्ट के पास मामला होता है, तो हाईकोर्ट को इस मामले में अपना हाथ नहीं बढ़ाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2018 के आदेश को खारिज कर दिया। इसमें उत्तर प्रदेश के सरकारी अधिकारियों को केवल सरकारी अस्पतालों में ही इलाज कराने की बात कही गई थी। उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में सुधार के लिए यह आदेश दिया था। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने कहा कि ऐसे निर्देश नीतिगत निर्णयों में हस्तक्षेप करते हैं और चिकित्सा उपचार के संबंध में व्यक्तिगत विकल्प को सीमित करते हैं। पीठ ने सरकारी अधिकारियों के लिए उपचार विकल्पों को सीमित करने के पीछे के औचित्य पर सवाल उठाया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उच्च न्यायालय नीतिगत निर्णय कैसे दे सकता है कि किसी व्यक्ति को कहां उपचार करवाना चाहिए या नहीं? हालांकि अस्पताल की स्थिति में सुधार करने का इरादा सराहनीय है, लेकिन ऐसे निर्देश व्यक्तिगत पसंद को दरकिनार नहीं कर सकते। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों को आम नागरिकों की तुलना में प्राथमिकता मिल सकती है, जिससे स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच में असमानता पैदा हो सकती है। नीति-निर्माण कार्यपालिका का विशेषाधिकार है तथा न्यायिक हस्तक्षेप को उनके सांविधानिक अधिदेश का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए।
कोरोना टीके से मौतों पर मुआवजे के लिए नीति पर केंद्र सरकार से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कोरोना टीकाकरण के मौतों समेत प्रतिकूल प्रभावों पर एक नीति तैयार करने की संभावना पर जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत को बताया गया कि कोरोना टीके के प्रतिकूल प्रभाव पर मुआवजा देने की कोई नीति नहीं है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के समक्ष केंद्र की तरफ से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि कोरोना महामारी को आपदा घोषित किया गया था। मौतों समेत टीकाकरण के बाद के प्रतिकूल प्रभाव (एईएफआई) को इसके तहत कवर नहीं किया गया था और ऐसे मामले में मुआवजे के लिए कोई नीति नहीं थी। हालांकि, पीठ ने कहा कि कोरोना से हुई मौतों और टीकाकरण से जुड़ी मौतों को अलग-अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए।
आखिरकार, संपूर्ण टीकाकरण अभियान महामारी की प्रतिक्रिया थी। आप यह नहीं कह सकते कि वे आपस में जुड़े हुए नहीं हैं। भाटी के जवाब देने के लिए तीन सप्ताह का समय मांगने पर पीठ ने मामले पर अगली सुनवाई 18 मार्च को तय कर दी।
केंद्र ने बताया, घुसपैठियों के निर्वासन प्रक्रिया पर उच्चस्तरीय मंथन जारी
असम से घुसपैठियों को देश से बाहर भेजने की प्रक्रिया उच्चतम कार्यकारी स्तर पर विचाराधीन है। केंद्र सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी दी। जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ के समक्ष सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि असम से चिह्नित घुसपैठियों को देश से बाहर भेजने का निर्णय 21 मार्च तक लिया जा सकता है। मेहता ने इस मामले में कोर्ट से कुछ और समय देने की मांग की, जिसे अदालत ने मान लिया। इस मामले की अगली सुनवाई 21 मार्च को होगी। दरअसल घुसपैठिया घोषित करने के बावजूद उन्हें हिरासत केंद्रों में रखने और निर्वासित नहीं करने पर सुप्रीम कोर्ट ने 4 फरवरी को असम सरकार की खिंचाई करते हुए कहा कि वह किस मुहूर्त का इंतजार कर रही है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि असम सरकार तथ्यों को दबा रही है। साथ ही कहा कि एक बार जब उनकी पहचान हो गई तो उन्हें तत्काल देश से बाहर करना चाहिए।
शीर्ष अदालत ने असम सरकार की उस दलील पर भी हैरानी जताई थी कि हिरासत में रखे गए लोगों के देश और पते की जानकारी नहीं होने के कारण उसने विदेश मंत्रालय को उनकी राष्ट्रीयता सत्यापन के फॉर्म नहीं भेजे। शीर्ष अदालत ने उसे त्रुटिपूर्ण हलफनामा बताते हुए असम सरकार की खिंचाई की थी। हलफनामे में असम ने 270 विदेशियों को मटिया ट्रांजिट कैंप में हिरासत में रखने का कोई निर्धारित कारण नहीं बता पाया था। शीर्ष अदालत ने असम विधि सेवा प्राधिकरण को उस कैंप का औचक निरीक्षण कर उस केंद्र की स्वच्छता और खाने की गुणवत्ता की जांच करने का निर्देश दिया था।