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SC Updates: सुप्रीम कोर्ट का निर्देश, बिल्डर-बैंक सांठगांठ मामले में संज्ञान ले विशेष अदालत

Tue, 20 Jan 2026 03:05 PM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर) - फोटो : ANI
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सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अदालत को बिल्डर-बैंक सांठगांठ मामले में सीबीआई के आरोपपत्र पर दो हफ्ते में संज्ञान लेने व मुकदमे की कार्यवाही आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है। आरोपपत्र में बैंकों और डेवलपर्स के बीच एनसीआर में घर खरीदारों को धोखा देने की अनैतिक सांठगांठ का आरोप है।
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मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ को सीबीआई की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि एजेंसी मार्च तक घर खरीदारों से जुड़े सभी 25 मामलों की जांच में महत्वपूर्ण प्रगति करेगी। पिछले साल जुलाई में अदालत ने सीबीआई को एनसीआर में बैंकों और डेवलपर्स के बीच अनुदान योजना का दुरुपयोग कर घर खरीदारों को धोखा देने के अनैतिक गठजोड़ के संबंध में 22 मामले दर्ज करने की अनुमति दी थी।
1,200 से अधिक परेशान घर खरीदारों की याचिकाओं पर मंगलवार को सुनवाई करते हुए, पीठ ने भाटी और न्यायमित्र राजीव जैन की दलीलों पर गौर करने के बाद नए निर्देश जारी किए। भाटी ने कहा कि सीबीआई ने दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट में तीन आरोपपत्र दाखिल किए हैं, लेकिन उन पर अभी संज्ञान नहीं लिया गया है। पीठ ने विशेष अदालत को दो सप्ताह के भीतर आरोपपत्रों पर संज्ञान लेने का निर्देश दिया। 
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सीबीआई न्यायमित्र से साझा करे आरोपपत्र की प्रतियां
पीठ ने सीबीआई को निर्देश दिया कि वह आरोपपत्रों की प्रतियां न्यायमित्र से साझा करे, जो अब तक की जांच की स्थिति के बारे में पीठ को अवगत कराएंगे। पीठ ने कहा कि यदि आगे और शिकायतें आती हैं तो फिर नई एफआईआर दर्ज करें।

23 बैंकों को 10 लाख रुपये जमा करने का निर्देश
पीठ ने इन मामलों में बैंकर रहे 23 बैंकों को यूनियन बैंक के विशेष खाते में 10 लाख रुपये जमा करने का निर्देश दिया। इस रकम का इस्तेमाल न्यायमित्र की ओर से पीठ की सहायता में किए गए खर्चों की भरपाई होगी।

 

छत्तीसगढ़: कथित शराब घोटाले से जुड़े मामलों में दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई टली
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के कथित शराब घोटाले से जुड़े मामलों में दाखिल 40 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई 28 जनवरी तक टाल दी है। इनमें आरोपियों की जमानत याचिकाएं भी शामिल हैं। शीर्ष अदालत ने साफ किया कि अगली तारीख पर सभी मामलों को एक साथ सुना जाएगा। इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ कर रही है। सुप्रीम कोर्ट 28 जनवरी को प्रवर्तन निदेशालय की उस याचिका पर भी सुनवाई करेगा, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल को मिली जमानत को चुनौती दी गई है। इससे पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जनवरी की शुरुआत में चैतन्य बघेल को ईडी और एसीबी-ईओडब्ल्यू से जुड़े दो मामलों में जमानत दी थी। ईडी का आरोप है कि चैतन्य बघेल शराब सिंडिकेट के प्रमुख थे और करीब एक हजार करोड़ रुपये की अवैध रकम के संचालन में उनकी भूमिका रही।

अदालत ने पूर्व नौकरशाह सौम्या चौरसिया की याचिका पर राज्य सरकार और जांच एजेंसियों को नोटिस जारी किया है। सौम्या चौरसिया, जो भूपेश बघेल के कार्यकाल में उप सचिव और विशेष कार्याधिकारी रह चुकी हैं, को कोयला लेवी मामले में जमानत मिलने के बाद शराब घोटाले में फिर से गिरफ्तार किया गया था। उनके वकीलों ने इसे एजेंसियों की ‘अतिरेक कार्रवाई’ बताया। जांच एजेंसियों के मुताबिक, इस कथित घोटाले से राज्य को भारी नुकसान हुआ और कुल अपराध से अर्जित रकम 3,500 करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकती है।

2021 से लंबित हेट स्पीच याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट का रुख नरम
सुप्रीम कोर्ट ने 2021 से लंबित हेट स्पीच से जुड़ी अधिकांश याचिकाएं बंद करने पर विचार जताते हुए अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। कोर्ट ने कहा कि केंद्र और राज्यों ने उसके निर्देशों का पर्याप्त पालन किया है और याचिकाकर्ता अब कानून के तहत अन्य उपाय अपना सकते हैं। हालांकि, नोएडा में 2021 में मुस्लिम मौलवी पर कथित हमले से जुड़े एक मामले की सुनवाई फरवरी में होगी। सुप्रीम कोर्ट ने पहले सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को स्वतः संज्ञान लेकर हेट स्पीच पर एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए थे और देरी को अवमानना माना था।

पूर्व विधायक और भाजपा नेता कुलदीप सेंगर की दुष्कर्म मामले में सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में आज पूर्व भाजपा नेता कुलदीप सेंगर के मामले में सुनवाई हुई, इस मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को दिल्ली हाई कोर्ट से मिली जमानत के खिलाफ सीबीआई की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टल गई है। अगली सुनवाई मंगलवार, 27 जनवरी को होगी।

एसआईआर का फैसला पूरी तरह विधायी, इसमें मार्गदर्शक सिद्धांत निर्धारित
निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि विभिन्न राज्यों में मतदाता सूचियों के एसआईआर पर उसका आदेश विधायी प्रकृति का है। इसमें मार्गदर्शक सिद्धांत निर्धारित हैं और आवश्यक दस्तावेजों का उल्लेख है। आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने दलीलें पेश कीं। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ बिहार समेत कई राज्यों में चुनाव आयोग की ओर से एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह की अंतिम सुनवाई कर रही थी।

गैर-सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की याचिका समेत अन्य याचिकाओं में चुनाव आयोग की शक्तियों के दायरे, चुनावी उद्देश्यों के लिए नागरिकता के निर्धारण और मतदान के मौलिक अधिकार से संबंधित महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाए गए हैं। राकेश द्विवेदी ने पीठ को बताया, एसआईआर का निर्णय एक सामान्य आदेश है जो असम मामले को छोड़कर पूरे देश पर लागू होता है। द्विवेदी ने मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन करने तथा चुनाव संचालन को विनियमित करने वाली कानूनी योजनाओं का उल्लेख किया। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 62 का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि मतदाता पंजीकरण विशिष्ट वैधानिक शर्तों के अधीन है। संविधान के अनुच्छेद 324 से 326, 1950 अधिनियम की धारा 19 के साथ पढ़े जाने पर, चुनाव आयोग पर यह सांविधानिक दायित्व डालते हैं कि सिर्फ नागरिकों को ही मतदाता के रूप में पंजीकृत किया जाए। संविधान निर्माताओं का यही उद्देश्य था। उन्होंने स्पष्ट किया कि एसआईआर प्रक्रिया इस धारणा पर आधारित नहीं है कि प्रत्येक मतदाता को दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत करना होगा। ब्यूरो

2021 से लंबित नफरती भाषणों से जुड़ी याचिकाएं करेगा बंद, फैसला सुरक्षित
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह 2021 से लंबित घृणास्पद भाषणों से संबंधित अधिकतर याचिकाओं को बंद कर देगा, जिनमें अदालत ने पुलिस को स्वतः संज्ञान लेते हुए एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया था। शीर्ष अदालत में केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और उत्तर प्रदेश सरकार ने बताया कि अदालत के निर्देशों का पर्याप्त अनुपालन किया जा रहा है। इसके बाद अदालत ने कुछ लोगों के समूह की ओर से दायर रिट याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने कहा, याचिकाकर्ता कानून के अनुसार अपने कानूनी उपाय अपना सकते हैं। हालांकि, शीर्ष अदालत ने नोएडा में एक मुस्लिम धर्मगुरु के खिलाफ 2021 में घृणा अपराध से संबंधित एक मामले की सुनवाई फरवरी तक स्थगित कर दी है ताकि मामले की सुनवाई की प्रगति का पता लगाया जा सके।

यूपी सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता रुचिरा गोयल ने बताया कि इस मामले में आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है और जांच में पाया गया कि यह मामला घृणा अपराध नहीं बल्कि लुटेरों के एक गिरोह का है, जो लोगों को अपनी कार में लिफ्ट देने का लालच देकर ठगते थे। हालांकि, मौलवी के वकील शाहरुख आलम ने यूपी सरकार के इस दावे पर संदेह व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य सरकार इसे अपराध का मामला मानने को तैयार नहीं है और अदालत को इस मामले की जांच करनी चाहिए। 

क्या ईडी हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर सकता है...सुप्रीम कोर्ट करेगा जांच
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात का परीक्षण करने का निर्णय लिया है कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर करने का अधिकार है या नहीं। केरल और तमिलनाडु सरकारों की अपीलों में उठाए गए इस मुद्दे पर जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने ईडी को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने के लिए कहा है। दोनों राज्यों ने केरल हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें ईडी को अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर करने का अधिकार होना बताया गया था।

केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने जबकि तमिलनाडु सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी. विल्सन और विक्रम चौधरी ने अदालत में दलीलें पेश कीं। मामला केरल सरकार की ओर से 2021 में गठित उस न्यायिक आयोग से जुड़ा है, जिसे यूएई गोल्ड स्मगलिंग मामले में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन और अन्य नेताओं को कथित रूप से फंसाने के प्रयासों की जांच के लिए बनाया गया था। इस आयोग के गठन को ईडी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। ईडी का कहना था कि आयोग की जांच मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत चल रही आपराधिक जांच में बाधा डाल सकती है। इस पर केरल हाईकोर्ट की एकल पीठ ने आयोग की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। बाद में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने भी इसे बरकरार रखा था।

तर्क- ईडी स्वतंत्र वैधानिक संस्था नहीं
राज्य सरकारों का तर्क है कि ईडी न तो कोई स्वतंत्र वैधानिक संस्था है और न ही कोई न्यायिक व्यक्तित्व। इसलिए उसे अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर करने का अधिकार नहीं है। उनके अनुसार, केंद्र सरकार या उसकी किसी एजेंसी और राज्य सरकार के बीच विवाद सिर्फ अनुच्छेद 131 के तहत सुप्रीम कोर्ट में ही सुलझाया जा सकता है। तमिलनाडु सरकार ने यह कहा कि ईडी वित्त मंत्रालय के अधीन एक विभाग मात्र है और उसे किसी भी परिस्थिति में रिट याचिका दायर करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।

साल में दो बार होगी अखिल भारतीय बार परीक्षा: बीसीआई
बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि अखिल भारतीय बार परीक्षा (एआईबीई) साल में दो बार आयोजित की जाएगी। एलएलबी अंतिम वर्ष के विधि छात्र भी इसमें बैठ सकेंगे। एआईबीई विधि स्नातकों को वकील के रूप में पंजीकृत करने के लिए एक योग्यता परीक्षा है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ, 2024 में दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें अंतिम सेमेस्टर के छात्रों को एआईबीई में बैठने की अनुमति देने के निर्देश मांगे गए थे। पीठ ने बीसीआई की दलीलें दर्ज कीं और याचिका का निपटारा कर दिया।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया के वकील ने बताया कि इस संबंध में बीसीआई नियम 2026 बना लिए गए हैं। 2024 में, अदालत ने अंतरिम आदेश पारित कर अंतिम वर्ष के छात्रों को उस वर्ष आयोजित एआईबीई परीक्षा में बैठने की अनुमति दी। 2023 में, सर्वोच्च न्यायालय ने बीसीआई को इस संबंध में नियम बनाने का निर्देश दिया था। 20 सितंबर, 2024 को, अंतिम वर्ष के छात्रों को मिली एक बड़ी राहत में, सर्वोच्च न्यायालय ने बीसीआई को निर्देश दिया कि उन्हें इस वर्ष एआईबीई परीक्षा में बैठने की अनुमति दी जाए।
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पंजाब केसरी समूह को सुप्रीम राहत अखबार का प्रकाशन बंद नहीं होगा
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पंजाब सरकार और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि लुधियाना स्थित पंजाब केसरी मीडिया समूह के प्रिंटिंग प्रेस का संचालन तुरंत बहाल किया जाए। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वीएम पंचोली की पीठ ने कहा कि प्रेस का कामकाज बिना किसी रुकावट के जारी रहना चाहिए, परिसर की स्थिति में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जाएगा।

nपीठ ने यह अंतरिम आदेश मीडिया समूह की ओर से दायर याचिका पर तत्काल सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत को बताया कि पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आदेश पर प्रिंटिंग प्रेस को बंद कर दिया गया था। इससे पहले समूह की ओर से संचालित एक होटल को भी बंद करने के आदेश दिए गए थे। मीडिया समूह ने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी की सरकार ने यह कार्रवाई सरकार की आलोचना करने वाली खबरों के कारण की।

याचिका में कहा गया कि 15 जनवरी 2026 को निरीक्षण और सैंपल लेने वाले दिन ही प्रेस बंद करने का आदेश जारी कर दिया गया। इसके लिए न तो जांच रिपोर्ट का इंतजार किया गया और न ही समूह को सुनवाई का कोई मौका दिया गया। मीडिया समूह ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया। इससे पहले पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने इसी मामले में याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रखते हुए अंतरिम राहत देने से इन्कार किया था और याचिकाकर्ताओं को एनजीटी जाने की सलाह दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका यह अंतरिम आदेश हाईकोर्ट के फैसले के बाद एक सप्ताह तक प्रभावी रहेगा। मीडिया समूह ने यह भी आरोप लगाया है कि राज्य सरकार ने अपने विज्ञापन रोक दिए हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
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