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Supreme Court: CJI पर जूता फेंकने जैसी घटना न हो दोबारा: SC ने अटॉर्नी जनरल और बार काउंसिल से मांगे सुझाव

Wed, 12 Nov 2025 02:29 PM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने बार एसोसिएशन की ओर से पेश हुए वकीलों से कहा कि वे इस मामले पर अपने सुझाव दें. अदालत राष्ट्रीय स्तर पर दिशा-निर्देश बनाने पर विचार कर रही है।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर) - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (12 नवंबर, 2025) को अटॉर्नी जनरल और बार काउंसिल से सीजेआई बी. आर. गवई पर जूता उछालने की कोशिश जैसी घटना से बचने के लिए सुझाव मांगे हैं। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सीजेआई गवई की ओर जूता फेंकने वाले वकील राकेश किशोर के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई पर अनिच्छा जताई थी। उन्होंने कहा था कि इस मामले पर जो भी करने की जरूरत होगी, अदालत उस पर गौर करेगी।
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जस्टिस सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से पेश हुए वकीलों से कहा कि वे इस मामले पर अपने सुझाव दें. अदालत राष्ट्रीय स्तर पर दिशा-निर्देश बनाने पर विचार कर रही है। उन्होंने कहा, ''अदालत के परिसर और बार एसोसिएशन के कमरों वगैरह में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए तीन-चार सुझाव दें।''

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, ''इस मामले में जो भी करने की जरूरत होगी, उसे हम अगली सुनवाई में देखेंगे। हम अटॉर्नी जनरल से भी अनुरोध करते हैं कि इस मामले पर अपना सुझाव दें।'' सुप्रीम कोर्ट में एससीबीए की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई हो रही थी, जिसमें वकील राकेश किशोर के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की मांग की गई थी। 
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राकेश किशोर ने छह अक्तूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सीजेआई गवई की ओर जूता फेंका था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 27 अक्तूबर 2025 को वकील राकेश के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई से इनकार कर दिया था। अदालत ने कहा था कि वो ऐसे मामलों को रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी करेगी।

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Supreme Court: क्या अग्रिम जमानत के लिए सत्र अदालत जाना अनिवार्य होना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

क्या वादी को अग्रिम जमानत के लिए पहले सत्र न्यायालय जाना अनिवार्य है या फिर यह वादी की मर्जी है कि वह पहले उच्च न्यायालय जाए? सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ इस मामले पर सुनवाई करेगी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले को तीन जजों की पीठ को भेजने का निर्देश दिया और पीठ के गठन तक मामले की सुनवाई स्थगित कर दी। सर्वोच्च अदालत ने इससे पहले इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा को न्याय मित्र नियुक्त किया था। 

केरल हाईकोर्ट को जारी किया नोटिस
दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने केरल उच्च न्यायालय की इस सामान्य प्रैक्टिस पर संज्ञान लिया है, जिसमें केरल हाईकोर्ट अक्सर वादी के सत्र न्यायालय जाए बिना, अग्रिम जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करता है। सुप्रीम कोर्ट पीठ ने इस पर नाराजगी जाहिर की और कहा कि अन्य राज्यों में ऐसा नहीं होता, लेकिन केरल हाईकोर्ट में ये सामान्य बात है। सुप्रीम कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल के जरिए केरल हाईकोर्ट को नोटिस जारी कर जवाब भी मांगा है। 

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने
दो लोगों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ये टिप्पणी की, जिनकी केरल हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि याचिकाकर्ताओं ने सीधे उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी और सत्र न्यायालय को बायपास कर दिया था। पीठ ने कहा कि क्योंकि उच्च न्यायालय वादी के बिना सत्र न्यायालय जाए उनकी याचिका पर सुनवाई कर रहा है, इसलिए कई तथ्य सामने नहीं आ पा रहे, जो सत्र न्यायालय जाने पर सामने आ सकते हैं। यही वजह है कि अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई करने का फैसला किया है कि क्या वादी का अग्रिम जमानत के लिए पहले सत्र न्यायालय जाना जरूरी है या फिर वह सीधे उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

Supreme Court: दिल्ली सरकार ने बताया- 'गरीब मरीजों की नहीं कर रहे देखभाल', SC ने अपोलो अस्पताल से मांगा जवाब

दिल्ली सरकार ने बुधवार (12 नवंबर, 2025) को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल ने बीते पांच साल में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के केवल 9-10 फीसदी बाह्य मरीजों और 7-9 फीसदी आंतरिक मरीजों को ही देखा है। दिल्ली सरकार ने इसे लीज समझौते का उल्लंघन बताया है। 

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले में दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग की महानिदेशक वत्सला अग्रवाल की ओर से दाखिल हलफनामे को रिकॉर्ड पर लिया। दिल्ली सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है, ''अस्पताल पर 40 फीसदी बाह्य मरीजों और 33 फीसदी आंतरिक मरीजों के देखभाल की बाध्यता थी। बीते 5 साल में ओपीडी में 9-10 फीसदी और आईपीडी में 7-9 फीसदी मरीजों की ही देखभाल की गई है।''

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई दिसंबर के दूसरे हफ्ते में तय की है। इसके साथ ही अपोलो अस्पताल को चलाने वाले इंद्रप्रस्थ मेडिकल कॉरपोरेशन लिमिटेड से इस पर जवाब दाखिल करने को कहा है। ये सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट के 22 सितंबर, 2009 के फैसले के खिलाफ आईएमसीएल की याचिका पर हो रही थी। इस मामले पर दिल्ली हाई कोर्ट ने अस्पताल प्रशासन को लीज समझौते के उल्लंघन का जिम्मेदार माना था। हाई कोर्ट ने कहा था कि गरीब मरीजों के इलाज में अस्पताल ने लीज समझौते का उल्लंघन किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की समान परिभाषा पर सुरक्षित रखा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में पर्यावरण संरक्षण, भूमि उपयोग विनियमन और खनन गतिविधियों को सुनिश्चित करने के लिए अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं को परिभाषित करने के मुद्दे पर बुधवार को फैसला सुरक्षित रख लिया। सीजेआई जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और वरिष्ठ अधिवक्ता एवं न्यायमित्र के परमेश्वर समेत कई वकीलों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।

सीजेआई ने कहा कि एक समान परिभाषा स्थापित करने के पीछे मुख्य उद्देश्य अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की रक्षा करना है। केंद्र की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल भाटी ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफ एंड सीसी) की ओररेस नियुक्त समिति की अंतिम रिपोर्ट का हवाला दिया। 

यह समिति एमसी मेहता बनाम भारत सरकार के लंबे समय से चले आ रहे पर्यावरण मामले में शीर्ष अदालत से जारी पूर्व निर्देशों के अनुपालन में थी। समिति ने रिपोर्ट में कहा, अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं के विशाल पारिस्थितिक और पर्यावरणीय महत्व को ध्यान में रखते हुए, इस क्षेत्र को और अधिक क्षरण से बचाना और संरक्षित करना अनिवार्य है। 

पैनल ने संबंधित हितधारकों के साथ उचित विचार-विमर्श किया। इसके बाद सिफारिश की कि सभी संबंधित राज्य सरकारें, जहां खनन गतिविधियां होती हैं, इस रिपोर्ट में सुझाई गई चरणबद्ध प्रक्रिया का पालन करते हुए अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं को चिह्नित करेंगी।
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राहुल गांधी के बयान को गलत तरीके से पेश करने का आरोप, सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी से पहले दी जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर रौशन सिन्हा को कांग्रेस नेता राहुल गांधी के लोकसभा भाषण को गलत तरीके से उद्धृत करने के आरोप में दायर मामले में अग्रिम जमानत देने का फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और अरविंद कुमार की पीठ ने कहा कि सिन्हा की गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है और मामले में किसी प्रकार की हिरासत में पूछताछ की जरूरत नहीं है। अदालत ने तेलंगाना हाई कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर ये फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी। मामला एक जुलाई, 2024 के राहुल गांधी के लोकसभा भाषण से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने कथित रूप से कहा था कि 'जो खुद को हिंदू कहते हैं, वे हिंसा, नफरत और झूठ में लगे रहते हैं।' अगले दिन सिन्हा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म- एक्स (X) पर राहुल गांधी की तस्वीर के साथ पोस्ट किया — 'जो हिंदू हैं, वे हिंसक हैं — राहुल गांधी।' इस पोस्ट पर विरोध शुरू हो गया और हैदराबाद के साइबर क्राइम थाने में कांग्रेस कार्यकर्ता ने शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद सिन्हा पर झूठे बयान प्रकाशित करने, जानबूझकर अपमान करने और जालसाजी जैसी धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया।
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