सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें राम मंदिर के निर्माण के लिए नियुक्त ट्रस्ट के सदस्य के रूप में हिंदू महासभा के स्वामी चक्रपाणि का नाम शामिल करने के लिए 'श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र' को निर्देश देने की मांग की गई थी।
चीफ जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की पीठ ने हिंदू महासभा नेता की ओर से पेश वकील की दलीलों को सुना और कहा कि याचिकाकर्ता के पास ट्रस्ट में शामिल होने का कोई निहित अधिकार नहीं है। वकील ने दलील दी कि अभी तक ट्रस्ट के लिए नियम नहीं बनाए गए हैं। बेंच ने कहा, या तो आप याचिका वापस ले लें या हम इसे खारिज कर देंगे।
बेंच ने आगे कहा, अगर हम रिट याचिका खारिज करते हैं तो कुछ नहीं होगा। आप अयोध्या ट्रस्ट का हिस्सा बनना चाहते हैं, अपना प्रतिनिधित्व करें। हम इस पर विचार नहीं करेंगे। हम इसमें बिल्कुल भी नहीं पड़ना चाहते हैं।
पांच जजों की संविधान पीठ ने 9 नवंबर 2019 को अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया था। शीर्ष कोर्ट ने केंद्र को फैसले की तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर अयोध्या अधिनियम, 1993 मेमं निश्चित क्षेत्र के अधिग्रहण के तहत एक योजना तैयार करने का निर्देश दिया था।
चीफ जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की एलीट समझ के हर उस स्वरूप को खारिज किया जाना चाहिए जो बताती है कि शिक्षित लोग ही बेहतर निर्णय लेने वाले होते हैं।
जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की अवधारणा लोकतंत्र और व्यक्तियों के उस विचार से जुड़ी हुई है, जिन्हें समाज ने अशिक्षित होने के कारण तिरस्कृत किया गया है। उन्होंने जबरदस्त राजनीतिक कौशल और स्थानीय समस्याओं के प्रति जागरूकता दिखाई है।
वह यहां 'यूनिवर्सल एंडल्ड फ्रैंचाइज : ट्रांसलेटिंग इंडियाज पॉलिटिकल ट्रांसफॉर्मेशन इनटू ए सोशल ट्रांसफोर्मेशन' विषय पर डॉ. एम. एम. सिंघवी मेमोरियल में बोल रहे थे। इस दौरान उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ भी मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थे।