सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पूर्व जेडी(एस) सांसद प्रज्वल रेवन्ना की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने दो लंबित बलात्कार मामलों की सुनवाई बंगलूरू की 81वीं अतिरिक्त सिटी सिविल एवं सेशंस कोर्ट से किसी अन्य अदालत में स्थानांतरित करने की मांग की थी। रेवन्ना ने दलील दी थी कि मौजूदा ट्रायल जज पहले ही उन्हें एक अन्य बलात्कार मामले में दोषी ठहरा चुके हैं, इसलिए उनके निष्पक्ष ट्रायल की संभावना कम है। हालांकि, सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की पीठ ने कहा कि जज की टिप्पणियां रिकॉर्ड और कर्नाटक हाईकोर्ट के अवलोकनों के आधार पर थीं और इन्हें पक्षपात का आधार नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि ट्रायल जज पुराने फैसले से प्रभावित हुए बिना वर्तमान मामलों का निर्णय सबूतों के आधार पर करेंगे।
मामला रेवन्ना के खिलाफ दायर गंभीर आरोपों से जुड़ा है, जिनमें दोहराया गया बलात्कार, छेड़छाड़, धमकी, सबूत नष्ट करना और आईटी एक्ट के तहत गोपनीयता उल्लंघन शामिल हैं। आरोप तब सामने आए जब करीब 2,900 कथित आपत्तिजनक वीडियो ऑनलाइन प्रसारित हुए थे। रेवन्ना को इसी साल अगस्त में एक मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी और वे वर्तमान में बंगलूरू की केंद्रीय जेल में बंद हैं। सुनवाई के दौरान उनके वकीलों ने ट्रायल जज की टिप्पणियों को हटाने की मांग की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे भी ठुकरा दिया और कहा कि इस तरह के आरोप न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने जैसे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रज्वल रेवन्ना की ट्रायल ट्रांसफर याचिका खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पूर्व जेडी(एस) सांसद प्रज्वल रेवन्ना की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने दो लंबित बलात्कार मामलों की सुनवाई बंगलूरू की 81वीं अतिरिक्त सिटी सिविल एवं सेशंस कोर्ट से किसी अन्य अदालत में स्थानांतरित करने की मांग की थी। रेवन्ना ने दलील दी थी कि मौजूदा ट्रायल जज पहले ही उन्हें एक अन्य बलात्कार मामले में दोषी ठहरा चुके हैं, इसलिए उनके निष्पक्ष ट्रायल की संभावना कम है। हालांकि, सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की पीठ ने कहा कि जज की टिप्पणियां रिकॉर्ड और कर्नाटक हाईकोर्ट के अवलोकनों के आधार पर थीं और इन्हें पक्षपात का आधार नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि ट्रायल जज पुराने फैसले से प्रभावित हुए बिना वर्तमान मामलों का निर्णय सबूतों के आधार पर करेंगे।
मामला रेवन्ना के खिलाफ दायर गंभीर आरोपों से जुड़ा है, जिनमें दोहराया गया बलात्कार, छेड़छाड़, धमकी, सबूत नष्ट करना और आईटी एक्ट के तहत गोपनीयता उल्लंघन शामिल हैं। आरोप तब सामने आए जब करीब 2,900 कथित आपत्तिजनक वीडियो ऑनलाइन प्रसारित हुए थे। रेवन्ना को इसी साल अगस्त में एक मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी और वे वर्तमान में बंगलूरू की केंद्रीय जेल में बंद हैं। सुनवाई के दौरान उनके वकीलों ने ट्रायल जज की टिप्पणियों को हटाने की मांग की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे भी ठुकरा दिया और कहा कि इस तरह के आरोप न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने जैसे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश के 27 वर्षीय आदिवासी युवक निलेश आदिवासी की संदिग्ध मौत की जांच के लिए तीन सदस्यीय एसआईटी गठित करने का आदेश दिया है। गुरुवार को सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की पीठ ने मध्यप्रदेश पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि दो दिनों के भीतर एसआईटी का गठन किया जाए। कोर्ट ने साफ किया कि एसआईटी में दो एसएसपी रैंक के अधिकारी शामिल होंगे, जो मध्यप्रदेश के मूल निवासी नहीं होंगे, जबकि तीसरा सदस्य एक महिला डीएसपी होंगी। न्यायालय ने कहा कि जांच निष्पक्ष और तेज होनी चाहिए तथा एक माह के भीतर पूरी करने का प्रयास किया जाए।
मामला तब सुर्खियों में आया था जब निलेश आदिवासी ने मंत्री गोविंद सिंह राजपूत के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत शिकायत दर्ज कराई थी। बाद में उसने दावा किया कि उससे जबरन शिकायत कराई गई थी। इसके तुरंत बाद उसने आत्महत्या कर ली और उसकी मौत के मामले में राजपूत के खिलाफ नया केस दर्ज हुआ। हाईकोर्ट ने पहले उनकी अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उन्हें गिरफ्तारी से अंतरिम राहत दे दी। कोर्ट ने कहा कि एसआईटी सभी कोणों से जांच करेगी, जिसमें वे पहलू भी शामिल होंगे जिनकी पहले जांच नहीं की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अवमानना की शक्ति न तो जजों के लिए व्यक्तिगत कवच है और न ही आलोचना को चुप कराने की तलवार। अदालतों को इस शक्ति का इस्तेमाल करते वक्त इस बात का ध्यान रखना चाहिए। शीर्ष अदालत ने इस टिप्पणी के साथ ही बॉम्बे हाईकोर्ट के स्वतः संज्ञान लेते हुए आपराधिक अवमानना मामले में एक महिला पर लगाई गई एक सप्ताह की सजा को माफ कर दिया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि दया न्यायिक विवेक का अभिन्न अंग बनी रहनी चाहिए और अवमानना करने वाले व्यक्ति के अपनी गलती को ईमानदारी से स्वीकार करने और उसके लिए प्रायश्चित करने की इच्छा व्यक्त करने पर दया दिखाई जानी चाहिए। पीठ ने कहा, दंड देने की शक्ति में क्षमा करने की शक्ति भी निहित है, बशर्ते अदालत के समक्ष उपस्थित व्यक्ति अपने उस कृत्य के लिए वास्तविक पश्चाताप और खेद व्यक्त करे जिसके कारण वह इस स्थिति में पहुंचा है।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को UAPA जैसे कड़े कानूनों के तहत लंबित मामलों की धीमी रफ्तार पर चिंता जताते हुए देशभर के सभी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को निर्देश दिया कि वे अपने-अपने राज्यों में लंबित ट्रायल की स्थिति की तत्काल समीक्षा करें। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कहा कि ऐसे कानूनों में आरोपी पर ‘रिवर्स बर्डन ऑफ प्रूफ’ यानी खुद को निर्दोष साबित करने का दबाव होता है, इसलिए राज्य की जिम्मेदारी है कि ट्रायल तेज़ी से हो। कोर्ट ने राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण को भी निर्देश दिया कि प्रत्येक अंडरट्रायल को उसके वकील रखने के अधिकार की जानकारी दी जाए और यदि वह लीगल एड वकील चाहता है तो उसकी नियुक्ति जल्द की जाए, ताकि सुनवाई बिना देरी शुरू हो सके।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट से यह भी कहा कि वे जांचें कि इन मामलों की सुनवाई के लिए कितनी विशेष अदालतें बनाई गई हैं, और यदि पर्याप्त विशेष अदालतें नहीं हैं तो सेशन कोर्ट की संख्या और उनकी क्षमता की समीक्षा की जाए। कोर्ट ने निर्देश दिया कि पांच साल से ज्यादा पुराने मामलों की रोजाना सुनवाई की जाए और अनावश्यक स्थगन न दिया जाए। साथ ही हाई कोर्ट समय-समय पर इन ट्रायल कोर्ट से प्रगति रिपोर्ट लेकर प्रशासनिक स्तर पर देरी के कारणों को दूर करे। ये निर्देश 2010 में जयनगर-एक्सप्रेस पटरी से उतरने के मामले में आरोपियों की जमानत के खिलाफ CBI की अपील पर सुनवाई के दौरान दिए गए।
तेलंगाना फोन टैपिंग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बड़ा आदेश जारी करते हुए राज्य के विशेष खुफिया ब्यूरो (SIB) के पूर्व प्रमुख टी प्रभाकर राव को शुक्रवार सुबह 11 बजे तक पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि गंभीर आरोपों की विस्तृत जांच सुनिश्चित करने के लिए उनका कस्टडी में रहना आवश्यक है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि राव को जुबली हिल्स पुलिस स्टेशन और जांच अधिकारी के सामने सरेंडर करना होगा तथा पूछताछ कानूनी प्रक्रिया के तहत होगी। सुनवाई के दौरान अदालत ने राव को घर से भोजन और नियमित दवाई लेने की अनुमति दी। राज्य सरकार के वकील सिद्धार्थ लूथरा ने बताया कि जांच के दौरान खोले गए आईक्लाउड खातों में कोई डेटा नहीं मिला और कई ईमेल अकाउंट भी नहीं खुल रहे हैं। सरकार ने बुधवार को आरोप लगाया था कि राव अदालत के आदेशों के बावजूद अपने आईक्लाउड डेटा को छिपा रहे हैं। कोर्ट अब इस मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार को करेगा। मामले में आगे की कार्रवाई पर पूरे राज्य की नजर है।