याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट तौर पर आदेश के बावजूद लोकपाल की नियुक्ति नहीं करने को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों पर अवमानना की कार्रवाई करने की मांग की। साथ ही मांग की कि शीर्ष न्यायालय संविधान में धारा 142 के तहत दी गई अपनी शक्तियों के तहत लोकपाल की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू कर दे।
उन्होंने कहा कि या तो कोर्ट सर्च कमेटी के सदस्यों के नाम तय कर दे या फिर सीधे लोकपाल का ही नाम तय करते हुए उसकी नियुक्ति कर दे। हालांकि फिलहाल पीठ ने ऐसा कोई कदम उठाने पर चर्चा नहीं की और सरकार को चार सप्ताह के अंदर शपथपत्र जमा कराने का आदेश जारी कर दिया।
वर्ष 2014 में लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम-2013 को संसद ने मंजूरी दे दी थी, जो प्रधानमंत्री समेत तमाम लोगों के भ्रष्टाचार की जांच कर सकता है। लेकिन 16वीं लोकसभा में तकनीकी कारणों से किसी को भी विपक्ष के नेता का दर्जा नहीं मिलने के कारण चार साल से लोकपाल की नियुक्ति अटकी हुई है।
संसद से मंजूर कानून में विपक्ष का नेता चयन समिति का अहम सदस्य माना गया है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति में अन्य सदस्यों के तौर पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस, एक सम्मानित अधिवक्ता और लोकसभा के स्पीकर शामिल होते हैं। पिछले साल 27 अप्रैल को शीर्ष न्यायालय ने केंद्र सरकार को लोकपाल नियुक्त करने का आदेश दिया था, लेकिन अब तक भी ये नियुक्ति प्रक्रिया में ही फंसी हुई है।
अटार्नी जनरल ने कहा, कोर्ट बताए किस तरह का ब्योरा चाहिए
पीठ की तरफ से चार सप्ताह में सर्च कमेटी के ब्योरे सहित शपथपत्र जमा कराने के आदेश पर अटार्नी जनरल केेके वेणुगोपाल ने आग्रह किया कि किस तरह का ब्योरा चाहिए, ये स्पष्ट किया जाए। इस पर जस्टिस गोगोई ने अन्य जजों से सलाह करने के बाद अटार्नी जनरल के इस आग्रह को रिकॉर्ड में दर्ज करने की बात कहते हुए कहा कि हम इसकी जरूरत नहीं समझते कि सरकार को ये निर्देश दिया जाए कि शपथपत्र में क्या शामिल करना चाहिए और क्या नहीं।