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'टिकट बरामद न होने पर भी देना होगा मुआवजा': ट्रेन से गिरकर हुई थी शख्स की मौत, सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

Sat, 26 Sep 2026 11:38 AM IST
देवेश त्रिपाठी पीटीआई, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात में 2017 के ट्रेन हादसे से जुड़े मामले में मृतक के माता-पिता को आठ लाख रुपये का मुआवजा बहाल कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मृत यात्री से टिकट बरामद नहीं होने मात्र से मुआवजे का दावा समाप्त नहीं किया जा सकता। पीठ ने कहा कि मृतक के पिता के शपथ पर दिए बयान और अस्पताल में लंबे इलाज सहित पूरे मामले को देखते हुए यात्री के वास्तविक होने की पुष्टि होती है।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी मृत यात्री से ट्रेन का टिकट बरामद न होना मुआवजे के दावे को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता। शीर्ष अदालत ने 2017 में गुजरात में चलती ट्रेन से गिरकर जान गंवाने वाले एक व्यक्ति के माता-पिता को दिया गया आठ लाख रुपये का मुआवजा बहाल कर दिया।
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न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति एएस चंदुरकर की पीठ ने गुजरात हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें महेशभाई की मौत के मामले में उनके माता-पिता को दिए गए मुआवजे को खारिज कर दिया गया था। महेशभाई 27 सितंबर 2017 को अहमदाबाद के रास्ते सूरत जा रहे थे। इसी दौरान अचानक झटका लगने से वह ट्रेन के सामान्य डिब्बे से नीचे गिर गए थे।

आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
शुक्रवार को पीठ ने कहा, “हाईकोर्ट ने रेलवे टिकट नहीं मिलने को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया। उसने पीड़ित के पिता द्वारा शपथ पर दिए गए बयान और इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया कि पीड़ित एक महीने से अधिक समय तक अस्पताल में भर्ती रहा था। संभावनाओं की प्रधानता के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पीड़ित एक वास्तविक यात्री था और उसके टिकट की बरामदगी नहीं होने से मुआवजे के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता।”
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17 जून 2022 को रेलवे दावा न्यायाधिकरण ने माना था कि महेशभाई एक ‘अवांछित घटना’ के शिकार हुए थे और दुर्घटनावश ट्रेन से गिरने के कारण उन्हें चोटें आई थीं। न्यायाधिकरण ने उनके माता-पिता को आठ लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था। इस राशि पर घटना की तारीख से आदेश की तारीख तक नौ प्रतिशत सालाना ब्याज भी निर्धारित किया गया था।

शीर्ष अदालत ने किस आधार पर माना मृतक को रेल यात्री?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घटना 27 सितंबर 2017 को हुई थी, जिसमें महेशभाई को गंभीर चोटें आई थीं और इसके बाद उन्हें एक महीने से अधिक समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। पीठ ने कहा, “हालांकि, 31 अक्टूबर 2017 को उनकी चोटों के कारण मृत्यु हो गई। सामान्य स्थिति में, जब पीड़ित का इलाज चल रहा था, तो यह काफी असंभावित है कि दावेदारों ने रेलवे टिकट सुरक्षित रखा होगा।”

पीठ ने कहा कि दावेदार के शपथ पर दिए गए बयान के बाद रेलवे पर जो जिम्मेदारी आई थी, उसे रेलवे पूरा नहीं कर सका। पूरे मामले को देखते हुए न्यायाधिकरण ने सही तरीके से माना कि महेशभाई वास्तविक यात्री थे और टिकट नहीं मिलने को दावेदारों के खिलाफ नहीं माना जा सकता।

मुआवजे का दावा दाखिल होने पर रेलवे ने तैयार की जांच रिपोर्ट
अदालत ने कहा कि मृतक के माता-पिता ने दावा किया था कि उनके बेटे का टिकट, रूमाल, कलाई घड़ी, कंघी और 800 से 900 रुपये की नकदी खो गई थी। मृतक के पिता ने शपथ पर बयान दिया था कि उनके बेटे ने टिकट खरीदा था। इससे दावेदारों ने शुरुआती जिम्मेदारी पूरी कर दी थी और इसके बाद इस दावे को गलत साबित करने की जिम्मेदारी रेलवे की थी।

पीठ ने कहा, “रेलवे की ओर से जिन गवाहों की जांच की गई, वे पीड़ित की जेबों की जांच करने में विफल रहे। इन परिस्थितियों में हमारा मानना है कि न्यायाधिकरण इस निष्कर्ष पर पहुंचने में सही था कि पीड़ित एक वास्तविक यात्री था।” पीठ ने यह भी कहा कि मृतक के माता-पिता की ओर से न्यायाधिकरण में मुआवजे का दावा दाखिल किए जाने के बाद अधिकारियों ने जांच रिपोर्ट तैयार की थी।

आदेश में सुप्रीम कोर्ट क्या-क्या कहा?
अदालत ने कहा, “यह रिपोर्ट अंततः 17 मई 2018 को तैयार की गई, यानी अवांछित घटना के करीब सात महीने बाद। जांच करने में हुई देरी के लिए दावेदारों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता और रेलवे अपनी ओर से जांच रिपोर्ट तैयार करने में हुई देरी का लाभ नहीं उठा सकता।” पीठ ने कहा कि वह उक्त जांच रिपोर्ट को नजरअंदाज करने के पक्ष में है और यह रिपोर्ट दावेदारों को मुआवजा पाने से रोकने का आधार नहीं बन सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “रिकॉर्ड पर मौजूद पूरी सामग्री पर विचार करने के बाद हम संतुष्ट हैं कि न्यायाधिकरण ने 1989 के अधिनियम की धारा 124-A के तहत दावेदारों को मुआवजा देने का सही आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने इस आधार पर उस आदेश को पलटकर सही नहीं किया कि दावेदार वह टिकट पेश नहीं कर सके, जिस पर मृतक यात्रा कर रहा था।”

शीर्ष अदालत ने रेलवे दावा न्यायाधिकरण के 17 जून 2022 के आदेश के तहत दिए गए आठ लाख रुपये के मुआवजे को बहाल करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि यह राशि मृतक के माता-पिता को 30 दिनों के भीतर दी जाए।
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