देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने 1991 के पूजा स्थल कानून (विशेष प्रावधान) अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई करने पर सहमति जताई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली शामिल थे, ने कहा कि अंतिम सुनवाई की तारीख तय की जाएगी।
केंद्र सरकार का जवाब लंबित
वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी, जो याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से पेश हुए, ने अदालत से कहा कि 12 अक्तूबर 2022 को ही मुद्दों को तय कर लिया गया था। उन्होंने बताया कि अदालत ने केंद्र सरकार को 31 अक्तूबर 2022 तक जवाब दाखिल करने को कहा था, लेकिन अब तक केंद्र ने अपना हलफनामा दाखिल नहीं किया है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि मार्च और अप्रैल में नौ-न्यायाधीशों की पीठ के दो मामले सूचीबद्ध हैं। उनके बाद इन याचिकाओं पर सुनवाई की तारीख तय की जाएगी।
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अजमेर दरगाह मामले में हस्तक्षेप से इनकार
- सुनवाई के दौरान राजस्थान की एक सिविल अदालत को अजमेर दरगाह प्रकरण में प्रभावी आदेश पारित करने से रोकने की मांग भी की गई।
- इस पर अदालत ने कहा कि यदि कोई आदेश पारित होता है तो उसे देखा जाएगा।
- साथ ही स्पष्ट किया कि सर्वोच्च अदालत के पूर्व आदेश सभी अदालतों पर बाध्यकारी हैं।
- यदि कोई आदेश उनके विपरीत होता है तो उसके परिणाम होंगे।
- हालांकि पीठ ने यह भी कहा कि यदि केवल नोटिस जारी किए जाते हैं या जवाब मांगा जाता है, तो ऐसे प्रक्रियात्मक आदेशों में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
पहले भी दिया जा चुका है निर्देश
12 दिसंबर 2024 को सर्वोच्च अदालत ने देशभर की अदालतों को निर्देश दिया था कि वे धार्मिक स्थलों को पुनः प्राप्त करने से संबंधित नए मुकदमों को स्वीकार न करें और लंबित मामलों में कोई प्रभावी अंतरिम या अंतिम आदेश पारित न करें। इस कानून का उल्लेख राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद शीर्षक विवाद के फैसले में भी किया गया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि 15 अगस्त 1947 को आधार तिथि बनाना मनमाना और असंगत है, जबकि अन्य पक्षों का कहना है कि यह कानून सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए जरूरी है।
क्या है मामला?
यह याचिकाएं 1991 के कानून की कुछ धाराओं को चुनौती देती हैं, जो 15 अगस्त 1947 की स्थिति के अनुसार किसी भी धार्मिक स्थल के स्वरूप और स्वामित्व को यथावत बनाए रखने का प्रावधान करती हैं। इस कानून के तहत किसी धार्मिक स्थल के स्वरूप में बदलाव या उसे पुनः प्राप्त करने के लिए मुकदमा दायर करने पर रोक है। केवल अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को इससे अपवाद रखा गया था।
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