ठाकरे गुट चाहता था कि स्पीकर चुनाव आयोग की शक्तियों को हड़प लें, शिंदे ब्लॉक ने SC को बताया
महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ एकनाथ शिंदे खेमे ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाला प्रतिद्वंद्वी पक्ष चाहता था कि राज्य विधानसभा के अध्यक्ष चुनाव आयोग की शक्तियों को 'हड़प' लें, जब 2022 के राजनीतिक संकट के दौरान राज्यपाल द्वारा लोकतंत्र में बहुमत की अंतिम परीक्षा- फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया गया था।
तत्कालीन अविभाजित शिवसेना के शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की पीठ को बताया कि शीर्ष अदालत की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 1994 के अपने फैसले में शक्ति परीक्षण की बात कही थी।
कौल ने बेंच से कहा कि अगर मुख्यमंत्री फ्लोर टेस्ट का सामना करने की जिम्मेदारी से बचते हैं, तो इसका मतलब है कि उन्हें सदन में बहुमत नहीं है।
हत्या के मामले में शीर्ष अदालत ने सजा पाए व्यक्ति को किया बरी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, न्याय से इतर दिया गया कबूलनामा आम तौर पर कमजोर साक्ष्य माना जाता है लेकिन इसके आधार पर दोषसिद्धि कायम रखी जा सकती है, बशर्ते यह कबूलनामा स्वैच्छिक व सत्य साबित हो और किसी भी प्रलोभन से मुक्त होना चाहिए। शीर्ष अदालत ने 1989 के एक हत्या के मामले में दोषी और आजीवन कारावास की सजा पाए व्यक्ति को बरी करते हुए कहा, उसकी सजा कथित असाधारण कबूलनामे पर आधारित थी।जस्टिस एएस ओका और जस्टिस राजेश बिंदल की पीठ ने पीठ ने कहा, इस तरह के कबूलनामे का साक्ष्य मूल्य उस व्यक्ति पर भी निर्भर करता है जिसे यह दिया गया है। मानव आचरण के प्राकृतिक तरीके से चलते हुए, आम तौर पर, एक व्यक्ति अपने किए अपराध के बारे में सिर्फ ऐसे व्यक्ति के सामने कबूल करेगा जिस पर उसका अटूट विश्वास हो। आम तौर पर, एक व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति के सामने गुनाह कबूल नहीं करेगा जो पूरी तरह से अजनबी है। पीठ ने कहा, इसके अलावा, जिन परिस्थितियों में यह कबूलनामा किया गया है, उन्हें देखते हुए अदालत को इकबालिया बयान की विश्वसनीयता से संतुष्ट होना होगा। पीठ ने कहा, नियम के रूप में पुष्टि की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, यदि एक न्यायेतर इकबालिया बयान को रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य साक्ष्यों से पुष्ट किया जाता है, तो यह अधिक विश्वसनीयता प्राप्त कर लेता है।
क्या है मामला
पीठ ने कहा, उक्त मामले में अपीलकर्ता पर चार अन्य लोगों के साथ विभिन्न धाराओं में दंडनीय अपराधों के लिए मुकदमा चलाया गया था। इसमें हत्या भी शामिल थी और उसे दोषी ठहराया गया था। यह नोट किया गया कि पटना हाईकोर्ट ने उसकी दोषसिद्धि की पुष्टि की, जबकि शेष चार अभियुक्तों को बरी कर दिया गया। पीठ ने कहा, यह आरोप लगाया गया था कि जून 1989 में, दो लोगों के लापता होने के संबंध में एक गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज की गई थी, और मुखबिर के अनुसार, उन्हें सूचना मिली थी कि उन दोनों की हत्या अपीलकर्ता ने अन्य लोगों के साथ मिलकर की थी। आरोप लगाया गया था कि अपीलकर्ता ने कुछ लोगों की उपस्थिति में स्वीकार किया था कि उसने और चार अन्य लोगों ने गला दबाकर दोनों की हत्या की थी और उनके शवों को एक खेत में छिपा दिया था। यह भी दावा किया गया कि दोनों शव खेत से बरामद किए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अभियोजन पक्ष ने 10 गवाहों का परीक्षण किया, जिनमें से शिकायतकर्ता समेत छह को पक्षद्रोही घोषित कर दिया गया।
केन्या की मुख्य न्यायाधीश मार्था के. कूमे ने दी सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
केन्या की मुख्य न्यायाधीश मार्था के. कूमे मंगलवार दोपहर सुप्रीम कोर्ट पहुंची। यहां उन्होंने पहली बेंच में शिवसेना मामले में संविधान पीठ की सुनवाई भी देखी। इस दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने उनका और केन्याई सुप्रीम कोर्ट के प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया। सीजेआई के साथ ही सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल और महेश जेठमलानी ने भी बार की ओर से केन्याई मुख्य न्यायाधीश का स्वागत किया। गौरतलब है कि मार्था के. कूमे केन्या की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश हैं।
बीते महीने सिंगापुर के मुख्य न्यायाधीश सुंदरेश मेनन ने सीजेआई की पीठ के समक्ष कार्यवाही में भाग लिया था।
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तेलंगाना सरकार की याचिका पर 20 मार्च को सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना सरकार की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई है। दरअसल, विधानसभा द्वारा पारित लंबित बिलों को अपनी सहमति देने के लिए तेलंगाना सरकार ने राज्यपाल को निर्देश देने के लिए SC का रुख किया था। अपनी याचिका में तेलंगाना सरकार ने प्रदेश के राज्यपाल को 10 लंबित विधेयकों को मंजूरी देने का निर्देश देने की मांग की है।
मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की पीठ ने कहा है कि वह इस याचिका पर 20 मार्च को सुनवाई करेगी।
CPCB को दिया ये निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) को खुदरा पेट्रोलियम आउटलेट्स पर वेपर रिकवरी सिस्टम (VRS) की लगाने का निर्देश दिया है। अदालत ने मंगलवार को कहा कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यह सुनिश्चित करे कि 10 लाख से अधिक आबादी वाले और 300 किलोलीटर से अधिक का कारोबार करने वाले विभिन्न शहरों में स्थित सभी खुदरा पेट्रोलियम आउटलेट पर वेपर रिकवरी सिस्टम (वीआरएस) लगा हो।
गौरतलब है कि वीआरएस वह प्रक्रिया है जो पेट्रोलियम उत्पादों से निकलने वाले हानिकारक कार्बनिक यौगिकों को रोक सकती है।
न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और जेबी पर्दीवाला की पीठ ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के एक आदेश के खिलाफ इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड और अन्य द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि वीआरएस तंत्र को सीपीसीबी द्वारा अपने 4 जून, 2021 के सर्कुलर में निर्धारित नई समय सीमा के भीतर स्थापित किया जाएगा। पीठ ने आगे कहा कि इसे दूसरे शब्दों में कहें तो सीपीसीबी यह सुनिश्चित करेगा कि एनजीटी द्वारा दिए गए आदेश में जारी निर्देशों का पूरी तरह से पालन किया जाए।