मथुरा में मुकदमेबाजी में फंसे कई प्रसिद्ध मंदिरों का प्रबंधन बतौर कोर्ट रिसीवर किसी वकील को सौंपे जाने की व्यवस्था को गंभीर बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया है। दरअसल, कई बार ऐसे आरोप लगे हैं कि वकील इन मंदिरों के प्रबंधन पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए मुकदमों को लंबा खींचते रहते हैं।
मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन और बरसाना के मंदिरों में वकीलों को रिसीवर बनाए जाने पर शीर्ष कोर्ट ने मथुरा के जिला न्यायाधीश को 19 दिसंबर तक रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है। जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने इस रिपोर्ट में उन मंदिरों की सूची देने के लिए कहा, जिनके मुकदमे लंबित हैं और जहां वकील रिसीवर नियुक्त हैं। यह भी जानना चाहा है कि ऐसे मुकदमे कब से लंबित हैं और मौजूदा स्थिति क्या है। अदालत ने रिसीवर के रूप में नियुक्त व्यक्तियों, विशेष रूप से अधिवक्ताओं के नाम और स्थिति बताने के लिए कहा है। यह भी जानना चाहा है कि रिसीवरों को दिया जाने वाला पारिश्रमिक क्या है?
कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करने की अनुमति नहीं
पीठ ने कहा, न्यायालयों को न्याय का मंदिर माना जाता है, इनका ऐसे लोगों के समूह के लाभ के लिए उपयोग या दुरुपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जिनका मुकदमों को लंबा खींचने में निहित स्वार्थ हो सकता है। किसी को भी मुकदमे लंबा खींचने की कोशिश में कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। पीठ ने चिंता जताई, ऐसे वकील निजी लाभ के लिए मंदिर के मुकदमों को लंबित रख सकते हैं क्योंकि वे बतौर रिसीवर तब तक मंदिर के मामलों को नियंत्रित कर सकते हैं, जब तक केस खत्म न हो जाए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को दी है चुनौती
सुप्रीम कोर्ट में मथुरा के मंदिरों में रिसीवरों के रूप में वकीलों की नियुक्ति के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 27 अगस्त के आदेश को ईश्वर चंद शर्मा की ओर से चुनौती दी गई है। शर्मा की ओर से पेश वकील अविकल प्रताप सिंह की दलीलों को सुनने के बाद शीर्ष कोर्ट ने मामले में कई प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया और सुनवाई की अगली तारीख 19 दिसंबर तय कर दी।
रिसीवर बनना अब प्रतिष्ठा का प्रतीक
हाईकोर्ट ने कहा था, दीवानी कार्यवाही को समाप्त कराने का कोई प्रयास नहीं किया जाता है क्योंकि मंदिर प्रशासन का पूरा नियंत्रण रिसीवर के हाथों में होता है। अब अधिकतर मुकदमे मंदिरों के प्रबंधन और रिसीवर की नियुक्ति के संबंध में हैं। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि एक वकील किसी मंदिर, विशेषकर वृंदावन और गोवर्धन के प्रशासन और प्रबंधन के लिए पर्याप्त समय नहीं दे सकता। मंदिर प्रबंधन में कौशल के साथ-साथ पूर्ण समर्पण और निष्ठा की आवश्यकता होती है, लेकिन यह मथुरा शहर में प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया है।
हाईकोर्ट ने कहा था, मंदिरों के प्रबंधन में स्थिति भयावह
27 अगस्त को आदेश में इलाबाहाद हाईकोर्ट ने कहा था, उत्तर प्रदेश, विशेष रूप से मथुरा जिले में, मंदिरों में ट्रस्टों के प्रशासन के संबंध में मामलों की भयावह स्थिति है। 197 मंदिरों में से वृंदावन, गोवर्धन, बलदेव, गोकुल, बरसाना, मठ आदि में स्थित मंदिरों के संबंध में दीवानी मुकदमे लंबित हैं। ये मुकदमेबाजी 1923 से लेकर 2024 तक यानी 100 साल तक पुराने हैं। प्रसिद्ध मंदिरों में मथुरा न्यायालय के वकीलों को रिसीवर नियुक्त किया गया है। रिसीवर का हित मुकदमे को लंबित रखने में है।
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