सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि अग्रिम जमानत का प्रावधान जीएसटी और कस्टम कानूनों पर भी लागू होता है। यानी, अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं हुई है, तब भी वह अग्रिम जमानत के लिए अदालत जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति एमएम सुंदरश और न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत ने पिछले साल 16 मई को इस मामले में अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया था।
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फैसला सुनाते हुए, सीजेआई संजीव खन्ना ने कहा कि अग्रिम जमानत से जुड़े दंड प्रक्रिया संहिता और नए कानून 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' के प्रावधान, जीएसटी और कस्टम कानूनों पर भी लागू होंगे। इस फैसले के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति को जीएसटी या कस्टम कानून के तहत गिरफ्तारी का डर है, तो वह अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता है, भले ही एफआईआर दर्ज न हुई हो। इस मामले में विस्तृत फैसला आना अभी बाकी है। यह याचिका 2018 में राधिका अग्रवाल नाम की महिला तरफ से दायर की गई थी।
भोपाल गैस त्रासदी: सुप्रीम कोर्ट ने जहरीले कचरे के निपटान पर हाईकोर्ट के आदेश में देने से इनकार किया
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को धार जिले के पिथमपुर क्षेत्र में 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के जहरीले कचरे को हटाने और उसके निपटान के लिए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार किया। जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच ने उस याचिका का निपटारा किया, जिसमें हाईकोर्ट के 3 दिसंबर 2024 के आदेश को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट के आदेश में राज्य सरकार को यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड की साइट से जहरीले कचरे को हटाने के लिए कदम उठाने का निर्देश दिया गया था।
मछली पालन 'घोटाला': सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के पूर्व मंत्री के खिलाफ मामला किया रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को 2008 में कथित 400 करोड़ रुपये के मछली पालन घोटाले में गुजरात के पूर्व मंत्री दिलीप संघानी के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जांच में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे ये साबित हो कि दिलीप संघानी ने रिश्वत मांगी या स्वीकार की थी।
मैला ढोने की प्रथा: हलफनामों से संतुष्ट नहीं सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली, कोलकाता और हैदराबाद के प्राधिकारियों के इस जवाब पर नाराजगी व्यक्त की है कि उन्होंने अपने-अपने शहरों में हाथ से मैला ढोने की प्रथा को कैसे बंद किया। जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच ने कोलकाता नगर निगम (केएमसी) के निगम आयुक्त, दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) के निदेशक (एस एंड डीएम) तथा ‘हैदराबाद मेट्रोपॉलिटन वाटर एंड सीवरेज बोर्ड’, तेलंगाना के प्रबंध निदेशक को अगली सुनवाई पर उपस्थित रहने का निर्देश दिया।
शीर्ष कोर्ट ने कहा कि केएमसी, डीजेबी और हैदराबाद मेट्रोपॉलिटन जल एवं सीवरेज बोर्ड ने यह स्पष्ट नहीं किया कि उनके शहरों में हाथ से मैला ढोने और सीवर की सफाई के कारण कुछ मौतें कैसे हुईं। कोर्ट ने वृहत बेंगलुरु महानगर पालिका के आयुक्त को भी उपस्थित रहने का निर्देश देते हुए कहा कि न तो कोई हलफनामा दिया गया और न ही न्यायालय में कोई प्रतिवेदन दिया गया। बेंच ने 19 फरवरी को कहा, ‘‘इस बीच, इस कोर्ट के समक्ष दिए गए पांच हलफनामों में से कोलकाता नगर निगम और दिल्ली जल बोर्ड की ओर से दायर दो हलफनामे बिल्कुल भी संतोषजनक नहीं हैं।’’
हाथ से मैला उठाने की प्रथा के खिलाफ एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस बात पर कोई स्पष्टता नहीं है कि इन शहरों में हाथ से मैला उठाने की प्रथा और हाथ से सीवर की सफाई बंद कर दी गई है या नहीं। केएमसी के हलफनामे के संबंध में बेंच ने कहा, ‘‘ ..फिर भी उनकी ओर से इस अदालत को यह बताने के लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है कि मैला ढोने और हाथ से सीवर की सफाई बंद होने के उनके दावे के बाद भी दो फरवरी 2025 को हाथ से मैला ढोने के कारण तीन मौतें क्यों हुईं।’’ पीठ ने कहा कि दिल्ली जल बोर्ड का हलफनामा इस प्रश्न का बहुत ही टालमटोल वाला उत्तर है कि क्या दिल्ली में हाथ से मैला ढोने की प्रथा और सीवर की सफाई जारी है या नहीं।
कोविड टीका दुष्प्रभाव: सुप्रीम कोर्ट ने नीति निर्धारण पर केंद्र से जवाब मांगा
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र से कोविड-19 टीकाकरण के प्रतिकूल प्रभावों को लेकर नीति तैयार करने की संभावना पर जवाब देने को कहा। इससे पहले कोर्ट को बताया गया कि कोविड-19 टीकाकरण के प्रतिकूल प्रभावों को लेकर मुआवजे की कोई योजना नहीं है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ को केंद्र सरकार ने सूचित किया कि महामारी को आपदा घोषित किया गया था और टीकाकरण के बाद होने वाले प्रतिकूल प्रभाव (एईएफआई) जिसमें मौतें भी शामिल हैं, इसके अंतर्गत नहीं आते हैं और ऐसे मामलों में मुआवजे के लिए कोई नीति नहीं है। केंद्र का प्रतिनिधित्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने किया।
पीठ ने हालांकि कहा कि कोविड-19 से होने वाली मौतों और टीके से संबंधित मौतों को अलग-अलग नहीं देखा जाना चाहिए। इसने कहा, ‘आखिरकार, पूरा टीकाकरण अभियान महामारी का जवाब था। आप यह नहीं कह सकते कि वे आपस में जुड़े नहीं हैं।’ विधि अधिकारी ने कहा कि कोविड-19 टीकाकरण के बाद एईएफआई से निपटने के लिए आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत कोई नीति नहीं है। उन्होंने कहा, ‘कोविड-19 को एक आपदा घोषित किया गया था, लेकिन टीकाकरण अभियान मेडिकल प्रोटोकॉल के अनुसार चलाया गया था। एईएफआई तंत्र यह आकलन करता है कि क्या मौत के मामले सीधे तौर पर टीके से जुड़े हैं।’
भाटी ने अदालत के सुझाव पर जवाब देने के लिए तीन सप्ताह का समय मांगा, जिसे पीठ ने स्वीकार कर लिया और केरल उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ केंद्र की अपील पर सुनवाई 18 मार्च के लिए स्थगित कर दी।