फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आयकर कानून: प्रावधान निरस्त करने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने सही माना

Wed, 07 Apr 2021 11:02 PM IST
गौरव पाण्डेय पीटीआई, नई दिल्ली

सार

आयकर कानून 1961 की धारा 254 (2ए) का एक प्रावधान आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (आईटीएटी) द्वारा आयकर विभाग के किसी करदाता के किए गए कर आकलन पर दिए गए स्थगन आदेश को 365 दिन से आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं देता है। इसमें बेशक करदाता की तरफ से अपील अथवा सुनवाई में किसी तरह की देरी की वजह नहीं हो तब भी स्थगन को 365 दिन से आगे नहीं बढ़ाने का प्रावधान है।
विज्ञापन
सर्वोच्च न्यायालय - फोटो : पीटीआई
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

उच्चतम न्यायालय ने आयकर कानून के एक प्रावधान को आंशिक तौर पर निरस्त करने के दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को सही ठहराया है। यह प्रावधान कर आकलन पर दिए गए स्थगन को 365 दिन से आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं देता है। न्यायाधिकरण में अपील में सुनवाई में देरी के लिए करदाता के किसी प्रकार से जिम्मेदार नहीं होने के बावजूद इसमें स्थगन को आगे नहीं बढ़ाया जाता है। उच्च न्यायालय ने इस प्रावधान को 'मनमाना और पक्षपातपूर्ण' बताया।

विज्ञापन


दिल्ली उच्च न्यायालय ने धारा 254 (2ए) के तीसरे प्रावधान को निरस्त कर दिया। तीसरे प्रावधान में करदाता की तरफ से देरी के लिए जिम्मेदार नहीं होने के बावजूद स्थगन आदेश को 365 दिन से आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी गई है। ताजा आदेश के बाद आईटीएटी का स्थगन आदेश यदि करदाता की तरफ से कोई देरी नहीं होती है तो अब 365 दिन के बाद स्वत: ही समाप्त नहीं होगा।

न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन की अध्यक्षता वाली पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को सही ठहराया। उन्होंने कहा, 'इसमें कोई शंका नही है कि वित्त अधिनियम 2008 के जरिए पेश किया गया आयकर कानून की उपरोक्त धारा का तीसरा प्रावधान एकतरफा और भेदभावपूर्ण दोनों है। इसलिये यह निरस्त करने योग्य है क्योंकि यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है।'
विज्ञापन


पीठ ने कहा कि दिए गए फैसले में यह ठीक ही कहा गया है कि जो असमान है उन्हें समान माना गया है। तीसरे प्रावधान में उन करदाताओं के बीच कोई फर्क नहीं किया गया है जो कि प्रक्रिया में देरी के लिए जिम्मेदार हैं और जो कि देरी के लिये जिम्मेदार नहीं हैं। न्यायमूर्ति नरीमन ने फैसले में कहा है कि आयकर कानून की धारा 254 (2ए) के तीसरे प्रावधान का उद्देश्य अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष अपीलों के त्वरित निपटारे पर जोर देता है इसमें कोई शक नहीं हो सकता है। खासतौर से ऐसे मामले जहां करदाताओं के पक्ष में स्थगन दिया गया है। लेकिन इस प्रकार का उद्देश्य अपने आप में इकतरफा और भेदभावपूर्ण नहीं हो सकता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें