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SC: आदिवासी समुदाय की स्वास्थ्य योजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट गंभीर, एनजीओ की याचिका पर केंद्र से मांगा जवाब

Fri, 21 Feb 2025 03:38 PM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

देश के आदिवासी आबादी के स्वास्थ्य में सुधार को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पहल की है। आदिवासियों की सेहत से जुड़ी योजनाओं को लेकर दायर याचिकाओं पर शीर्ष अदालत ने केंद्र और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से जवाब मांगा है। 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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देश के आदिवासी आबादी के स्वास्थ्य में सुधार को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पहल की है। आदिवासियों की सेहत से जुड़ी योजनाओं को लेकर दायर याचिकाओं पर शीर्ष अदालत ने केंद्र और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से जवाब मांगा है। 

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एनजीओ महान ट्रस्ट के अध्यक्ष डॉ. आशीष सातव और दो अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर याचिका को न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया। इसके बाद पीठ ने केंद्र और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को नोटिस जारी करके जवाब मांगा है। कोर्ट ने मामले की सुनवाई चार सप्ताह बाद करने के लिए कहा है। 

एनजीओ की ओर से दायर याचिका पर याचिकाकर्ता के वकील रानु पुरोहित ने कहा कि एनजीओ महाराष्ट्र के मेलाघाट क्षेत्र में आदिवासी समुदाय को मुफ्त चिकित्सा देखभाल और स्वास्थ्य सेवा प्रदान कर रहा है। ट्रस्ट ने बारीकी से समुदाय के लोगों की स्वास्थ्य समस्याओं को परखा है। साथ ही इनके समाधान भी सुझाए हैं।
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याचिका में घर आधारित बाल देखभाल, गंभीर कुपोषण का समुदाय आधारित प्रबंधन, आर्थिक रूप से उत्पादक आयु वर्ग के लिए मृत्यु नियंत्रण कार्यक्रम और स्वास्थ्य क्षेत्र में सार्वजनिक निजी भागीदारी सहित उपायों को लागू करने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि महाराष्ट्र में यह उपाय बॉम्बे हाईकोर्ट के निर्देश के बाद क्रियान्वित किए गए। 2015 से 2023 तक राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी समुदायों की स्वास्थ्य स्थिति में सुधार के लिए ट्रस्ट और प्रतिवादी अधिकारियों के अधिकारियों के बीच विभिन्न बैठकें भी हुईं। ट्रस्ट ने अपनी सिफारिशों पर विचार करने के लिए अधिकारियों को आवेदन भी दिया, लेकिन कुछ नहीं किया गया। 

याचिकाकर्ताओं ने अधिकारियों से देशव्यापी स्तर पर आदिवासी आबादी के स्वास्थ्य में सुधार के लिए उनकी सिफारिशों पर विचार करने और उन्हें उचित रूप से लागू करने की मांग की। याचिका में जनजातीय क्षेत्रों के विकास के लिए निर्धारित धन के उपयोग न होने का भी दावा किया गया है। याचिका में आरोप लगाया गया कि कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी के चलते लाभों का मनमाना और असमान वितरण हुआ। यह समानता और सम्मानजनक जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।
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