सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को आधिकारिक कामकाज के लिए मिली कानूनी छूट को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा है। याचिका में इस सुरक्षा को संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 के खिलाफ बताया गया है। क्या चुनाव आयुक्तों को मिली व्यापक छूट पर अदालत ने क्यों सख्ती दिखाई? क्या इस प्रावधान से जवाबदेही प्रभावित होती है? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कामकाज के लिए कानूनी कार्रवाई से मिली व्यापक छूट का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने इस छूट को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर मंगलवार को केंद्र सरकार और भारतीय निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया। अदालत के इस कदम से चुनाव आयुक्तों को मिली कानूनी सुरक्षा और उनकी जवाबदेही से जुड़े सवाल फिर चर्चा में आ गए हैं। याचिका में कहा गया है कि इस तरह की व्यापक छूट संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों को सामान्य कानूनी प्रक्रिया से बाहर कर सकती है।
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाले कानून पर भी विवाद क्यों?
वर्ष 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता पर भी न्यायिक जांच चल रही है। विवाद उस व्यवस्था को लेकर है, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर रखा गया है। 23 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट की दो न्यायाधीशों की पीठ ने इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को संविधान पीठ के पास भेजने के सवाल पर अलग-अलग राय दी थी। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने बड़ी पीठ के पास मामला भेजने की मांग खारिज की, जबकि न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने इसे संविधान की व्याख्या से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल मानते हुए संविधान पीठ के सामने रखने का समर्थन किया। दोनों न्यायाधीशों ने मामले के कागजात मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष रखने का निर्देश दिया, ताकि संविधान पीठ गठित करने पर विचार किया जा सके। इस कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री की ओर से नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। इससे पहले मार्च 2023 में अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम व्यवस्था के तहत समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश शामिल थे।