वैवाहिक संबंध को दोबारा बहाल करने के प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल से मदद मांगी है। याचिका में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा-9 की वैधता को चुनौती दी गई है।
इस प्रावधान को वर्ष 1984 में दिल्ली हाईकोर्ट ने वैध ठहराया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1984 में ही एक मामले में इस प्रावधान को वैध करार दिया था। यह याचिका दो विधि छात्रों की ओर से दायर की गई है।
जस्टिस आरएफ नरीमन की पीठ के समक्ष वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गत वर्ष 15 मार्च को केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था लेकिन अब तक सरकार की ओर से जवाब दाखिल नहीं किया गया है, जबकि यह महत्वपूर्ण मामला है। इस पर पीठ ने सरकार को आठ हफ्ते में जवाब दाखिल करने के लिए कहा है।
ओजस्व पाठक ओर मयंक गुप्ता द्वारा दायर इस याचिका में यह दावा किया गया है कि यह प्रावधान पितृसत्तात्मक सोच पर आधारित है। यह प्रावधान रूढ़िवादी मानसिकता को दर्शाता है। इस प्रावधान के तहत अगर महिला, अपने पति से अलग होना चाहती है तो उसे पति के साथ रहने के लिए बाध्य किया जा सकता है। याचिकाकर्ताओं ने अपने समर्थन में निजता के अधिकार, समलैंगिकता और एडल्टरी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया है।