सुप्रीम कोर्ट ने सेमवार को चुनाव आयोग से यह जानना चाहा है कि 2014 केलोकसभा चुनाव में उसने चुनावी धांधली केकितने मुकदमों पर कार्रवाई की थी। साथ ही शीर्ष अदालत ने यह भी बताने केलिए कहा कि पिछले लोकसभा चुनाव केदौरान रिश्वत के तौर पर मतदाताओं को दी जानी कितनी नकदी जब्त की गई थी।
न्यायमूर्ति एनवी रमण और न्यायमूर्ति मोहन एम शांतनागौदार की पीठ ने चुनाव आयोग केवकील अमित शर्मा की सलाह पर अमल करते हुए आयोग को जवाब देने केलिए कहा है। पीठ ने आयोग को चार्ट के जरिए चुनाव के दौरान मिलने वाली शिकायतों पर शुरू की गई कार्रवाई के बारे में बताने केलिए कहा है, जिससे पता चल सके कि आपराधिक मामलों की मौजूदा स्थिति क्या है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश कर्नाटक हाईकोर्ट द्वारा 12 फरवरी, 2015 केदिए आदेश की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर दिया है। वास्तव में हाईकोर्ट ने प्रतीक परासमपुरिया केखिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमे को निरस्त कर दिया था। बेलारी लोकसभा क्षेत्र में चुनाव आयोग के दस्ते में प्रतीक के पास 20.48 लाख रुपये नकद और कई अन्य चीजें जब्त की थी। कर्नाटक सरकार ने हाईकोर्ट केइस आदेश को चुनौती दी है। इससे पहले पीठ ने यह जानना चाहा था कि आखिर मतदाताओं को रिश्वत देने सहित अन्य चुनावी धोखाधड़ी केमुकदमों पर प्रभावी तरीके से क्यों नहीं कार्रवाई की जाती है।
शीर्ष अदालत ने कहा था कि हमारा मानना है कि संविधान के तहत चुनाव आयोग केपास बहुत अधिकार है। अदालत ने कहा था कि हमें ऐसी जानकारी दी गई कि चुनाव केदौरान होने वाले आपराधिक मुकदमों पर प्रभावी तरीके से कार्रवाई नहीं की जाती है। शीर्ष अदालत ने केंद्र व चुनाव आयोग से यह भी जानना चाहा था कि चुनाव से संबंधित बरामदगी, जब्ती व छापों को लेकर क्या दिशानिर्देश है और क्या प्रक्रिया है।
पिछले लोकसभा चुनाव में प्रतीक केघर पर चुनाव आयोग के दस्ते ने छापे मारकर नकदी, उपहार, शराब आदि जब्त की थी। लेकिन हाईकोर्ट ने यह कहते हुए एफआईर निरस्त कर दी कि शिकायत में यह बताया गया था कि आरोपी किसको घूस देना चाहता था और रिश्वत देने की उसने कौन सा तरीका अपनाया था।