सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता सचिन जैन की ओर से कहा गया कि जहां आयुष्मान भारत के तहत रोजाना 4000 रुपये तय की गई है। वहीं, दूसरे लोगों से निजी अस्पताल 50000 रुपये तक वसूल रहे हैं। उनका कहना था कि इस संकट के दौर में निजी अस्पतालों को सस्ती दरों पर कोरोना के मरीजों का इलाज करना चाहिए।
इस याचिका में देशभर के निजी अस्पतालों में कोरोना के मरीजों के इलाज को रेग्युलेट करने की मांग की गई है। याचिका में इलाज के लिए उचित फीस तय करने की गुहार लगाई गई है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 30 अप्रैल को नोटिस जारी किया था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि निजी अस्पताल द्वारा कोरोना के मरीजों से इलाज के नाम पर मोटी रकम वसूली जा रही है।
दूसरी तरफ अस्पताल फेडरेशन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने कहा कि आयुष्मान भारत की दरों के तहत इलाज संभव नहीं है। आयुष्मान भारत में बहुत ही कम दरें तय की गई है। उन्होंने कहा कि बीमा कंपनियों द्वारा तय की गई दरों पर मरीजों का इलाज किया जा सकता है।
साल्वे ने कहा कि कोरोना के कारण अस्पतालों में मरीजों की संख्या में 70 फीसदी तक की गिरावट आई है और 60 से 70 फीसदी का नुकसान हो रहा है। हालांकि, पीठ ने फेडरेशन को इस संबंध में दो हफ्ते के भीतर हलफनामा दाखिल कर अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए कहा है।
सर गंगाराम अस्पताल ने कहा, कोरोना के चलते बंद करने की नौबत
वही सुनवाई के दौरान दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल ने पीठ को बताया कि दिल्ली सरकार ने उसके अस्पताल को कोरोना अस्पताल में तब्दील कर दिया है। अस्पताल की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि अस्पताल में दूसरे मरीजों का आना बंद हो गया है। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में तो अस्पताल को बंद करने की नौबत आ सकती है।