सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि व्यभिचार के मामले में हमेशा पुरुष ही अपराधी क्यों ठहराए जाते हैं, महिला क्यों नहीं। कोर्ट ने 150 साल पुराने इस कानून के प्रावधान की समीक्षा करने का फैसला लिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह प्रावधान महिला और पुरुष को समान नजर से नहीं देखता। साथ ही यह भी कहा कि आपराधिक कानून पुरुष और महिलाओं के लिए बराबर है, लेकिन आईपीसी की धारा-497 में इस सिद्धांत का अभाव है।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने धारा-497 का परीक्षण करने का निर्णय लेते हुए कहा कि कोई कानून महिलाओं को यह कहते हुए संरक्षण नहीं दे सकता कि व्यभिचार के मामले में हमेशा महिलाएं पीड़िता होती हैं। सुप्रीम कोर्ट यह देखेगा कि धारा-497 में सुधार किया जा सकता है या नहीं। धारा-497 के तहत व्यभिचार को अपराध की श्रेणी में रखा गया है, लेकिन यह अपराध पुरुषों तक ही सीमित है।
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शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि जब समाज प्रगति करता है तो लोगों को नए अधिकार मिलते हैं। नई सोच पैदा होती है। ऐसे में धारा-497 का पुनरीक्षण जरूरी है। पीठ ने यह भी कहा कि जब संविधान महिलाओं और पुरुषों को एकसमान अधिकार देता है तो कानून महिलाओं को पराधीनता के तौर पर कैसे देख सकता है। सुप्रीम कोर्ट अब चार हफ्ते बाद मामले की सुनवाई करेगा।