सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सरकारी वकीलों को ‘पोस्ट ऑफिस’ की तरह महज इधर की बात उधर पहुंचाने का काम नहीं करना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा है कि सरकारी वकील को सरकार के हिसाब से नहीं बल्कि निष्पक्ष होकर काम करना चाहिए। शीर्ष अदालत की ये टिप्पणी सरकार बदलने के बाद राजनीतिक हित साधने के लिए पुराने मुकदमों को बंद करने की कोशिश के संबंध में अहम मानी जा रही है।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने हाईकोर्ट की तरफ से एक मुकदमा वापस लेने की इजाजत देने के मामले में सुनवाई करते हुए ये टिप्पणी की। अब्दुल वहाब की याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा कि सरकार अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमे को वापस लेने का निर्णय लेती है तो भी अभियोजन अधिकारियों को सरकारी निर्णयों को ‘ब्रह्म-वाक्य’ नहीं मानना चाहिए और अपने विवेक से निष्पक्ष होकर निर्णय लेना चाहिए।
पीठ ने कहा, कुछ अपराध सामाजिक ढांचे को नष्ट कर देते हैं। ऐसे अपराध हर नागरिक से जुड़े होते हैं और वह अपने हिसाब से प्रतिक्रिया देते हैं। ऐसे में अभियोजन अधिकारियों को यह बात दिमाग में रखनी चाहिए कि मुकदमों को वापस लेने से समाज पर क्या फर्क पड़ सकता है। इतना कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अब्दुल वहाब की याचिका पर मामले को पुनर्विचार के लिए चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के पास भेजने का आदेश दिया।
अदालत का सहयोग भी सरकारी वकील का काम
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि अभियोजन अधिकारी का काम सरकारी निर्देशों पर चलने के अलावा अदालत को सहयोग करना भी है। सुप्रीम कोर्ट ने शिव नंदन पासवान मामले में संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अभियोजन अधिकारी व सहायक अभियोजन अधिकारी की भूमिका बेहद स्पष्ट है कि मुकदमा चाहे कैसा भी हो, उन्हें निष्पक्ष तरीके से काम करना चाहिए।