सितंबर 2022 के अपने आदेश में, उच्च न्यायालय ने 16 वर्षीय लड़की की कस्टडी याचिकाकर्ता पति को सौंपने का निर्देश दिया और कहा कि दोनों मुस्लिम हैं। उच्च न्यायालय ने एक फैसले का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि मुस्लिम लड़की का विवाह मुसलमानों के पर्सनल लॉ के तहत ही होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि ये अजीब है कि पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश को एनसीपीसीआर (राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग) द्वारा चुनौती दी जा रही है। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश एक मुस्लिम दंपत्ति को सुरक्षा प्रदान की थी। उच्च न्यायालय के साल 2022 में दिए अपने आदेश में कहा था कि 21 वर्षीय युवक से शादी करने वाली लड़की की आयु 16 वर्ष से अधिक है। उच्च न्यायालय ने दंपति को सुरक्षा देते हुए ये भी कहा कि मुस्लिम लड़की की शादी मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत आता है।
विज्ञापन
पीठ ने एनसीपीसीआर की याचिका पर जताई हैरानी
एनसीपीसीआर ने उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी की याचिका खारिज करते हुए जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने आश्चर्य जताया कि आयोग, उच्च न्यायालय के आदेश से क्यों परेशान है? पीठ ने कहा कि एनसीपीसीआर के पास आदेश को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है। एनसीपीसीआर के वकील ने कहा कि मामले में कानून के प्रश्न को ध्यान में रखते हुए उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी गई थी। पीठ ने कहा कि कानून का कोई सवाल ही नहीं है, और कहा कि बच्चों के संरक्षण के लिए गठित एनसीपीसीआर, सुरक्षा प्रदान करने वाले आदेश को कैसे चुनौती दे सकता है। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के आदेशों को चुनौती देने वाली एक अन्य याचिका को भी खारिज कर दिया।
क्या है पूरा मामला
सितंबर 2022 के अपने आदेश में, उच्च न्यायालय ने 16 वर्षीय लड़की की कस्टडी याचिकाकर्ता पति को सौंपने का निर्देश दिया और कहा कि दोनों मुस्लिम हैं। उच्च न्यायालय ने एक फैसले का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि मुस्लिम लड़की का विवाह मुसलमानों के पर्सनल लॉ के तहत ही होता है। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा, एक मुस्लिम महिला की यौवनावस्था 15 वर्ष है और यौवनावस्था प्राप्त करने के बाद वह अपनी इच्छा और सहमति से अपनी पसंद के व्यक्ति से निकाह कर सकती है और ऐसा विवाह बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 की धारा 12 के अनुसार अमान्य नहीं होगा।