आधार मामले की सुनवाई कर रहे
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि अगर हर लेनदेन को किसी व्यक्ति की बायोमैट्रिक पहचान से जोड़ा जाएगा तो यह सूचना के खजाने में बदल सकता है। ऐसे में डाटा की सुरक्षा किया जाना आवश्यक है। अन्यथा इसका दुरुपयोग संभव है।
चीफ जस्टिस
दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ आधार और इसे अनिवार्य बनाने वाले 2016 के कानून के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। पीठ ने यह कहते हुए यूआईडीएआई को अपनी आशंकाओं से अवगत कराया कि प्रत्येक लेनदेन के लिए आधार नंबर की बायोमैट्रिक पहचान नागरिकों के मेटा डाटा एकत्रीकरण का कारण बन सकती है। इसका इस्तेमाल सर्विलांस समेत कई उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।
पीठ के दूसरे जजों जस्टिम एके सीकरी, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण ने कहा, फिंगरप्रिंट अपने आप से किसी की पहचान सार्वजनिक नहीं करेंगे लेकिन जब इसे दूसरी सूचनाओं के साथ जोड़ दिया जाएगा तो यह सूचनाओं का खजाना बन जाएगा और तब डाटा सुरक्षा की आवश्यकता होगी। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, अगर मेरा बायोमैट्रिक हर लेनदेन के साथ जोड़ा जाएगा तो यह सिर्फ एक पहचान बन जाएगा। उन्होंने कहा, अगर कोई व्यक्ति जन्म से नर्सरी में प्रवेश, सीबीएसई परीक्षा, पहली नौकरी और विदेश दौरे के लिए आधार पहचान देगा तो यह सूचनाओं का खजाना बन जाएगा। इसे कई उद्देश्यों के लिए एकत्रित कर दुरुपयोग किया जा सकता है।