सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले यह साबित करना बहुत जरूरी है कि आरोपी ने ही प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उकसाया है।जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 306 को कायम रखने के लिए यह साबित होना आवश्यक है कि आरोपी ने किसी प्रत्यक्ष या परोक्ष कृत्य से आत्महत्या में योगदान दिया है। अदालत ने यह टिप्पणी उस समय की जब उसने एक व्यक्ति और उसके परिवार के सदस्यों को उसकी 25 वर्षीय पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में बरी कर दिया।
शीर्ष अदालत ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने की घटना मृतक के आत्महत्या करने के करीब ही होनी चाहिए। अदालत ने कहा कि उकसावे से आत्महत्या के लिए उकसाने की स्पष्ट मंशा का पता चलना चाहिए। अभियुक्त व्यक्ति की ओर से इस तरह की मंशा रिकॉर्ड से स्पष्ट रूप से दिखाए बिना, उपरोक्त धारा के तहत आरोप कायम नहीं रखा जा सकता है।
शीर्ष अदालत ने तीन व्यक्तियों (पति, उसके पिता और भाई) की दायर अपील पर अपना फैसला सुनाया, जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट के अक्तूबर 2022 के फैसले को चुनौती दी गई थी। इसमें मामले से उन्हें बरी करने से इन्कार करने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ उनकी डिस्चार्ज याचिका को खारिज कर दिया गया था। धारा 306 के अलावा, उन पर आईपीसी की धारा 34 (सामान्य इरादा) के तहत आरोप लगाए गए थे। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि 25 वर्षीय महिला की जान जाना दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। चूंकि यह साबित नहीं हो पाया कि महिला को इस तरह उकसाया गया कि उसके पास आत्महत्या करने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा इसलिए अपीलकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखने से कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। अदालत ने पूछा कि क्या हम इस तरह की अपील को स्वीकार करने के लिए इच्छुक हैं।
मृतका के भाई और मां के बयान अलग-अलग पाए गए
बता दें कि 20 मार्च, 2015 को अहमदनगर के एक पुलिस थाने में दुर्घटनावश मौत की रिपोर्ट दर्ज की गई थी, जब महिला के भाई ने बताया था कि उसकी बहन ने अपने माता-पिता के घर पर आत्महत्या कर ली थी, जहां वह पिछले दो वर्षों से रह रही थी। वहीं, 25 मार्च, 2015 को महिला की मां ने पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई थी कि उसकी बेटी की शादी नवंबर, 2009 में हुई थी, लेकिन उसे उसके ससुराल में मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था। शिकायत के बाद पति और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया गया था।