सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि अदालत किसी भी तरह की पब्लिसिटी या नैरेटिव बिल्डिंग से प्रभावित नहीं होती, लेकिन विचाराधीन न्यायिक मामलों पर अधकचरी और विकृत रिपोर्टिंग जनमानस को भ्रमित करती है, जो गंभीर चिंता का विषय है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ उन व्यक्तियों की पुनर्वापसी से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी, जिन्हें आवश्यक प्रक्रिया का पालन किए बिना 27 जून को बांग्लादेश भेज दिया गया था। ये परिवार करीब दो दशक से दिल्ली के रोहिणी क्षेत्र में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम कर रहे थे और उन्हें बांग्लादेशी होने के संदेह में 18 जून को हिरासत में लिया गया था।
सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि सुनाली खातून, जो गर्भवती हैं वह बेटे के साथ भारत लौट आए हैं। पीठ ने केंद्र सरकार की अपील पर सुनवाई के लिए 6 जनवरी की तारीख तय की, जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने कहा था कि केंद्र ने निर्वासन से पहले 30 दिन तक कोई अनिवार्य जांच नहीं की, जबकि गृह मंत्रालय के अपने ही प्रोटोकॉल में राज्य सरकार द्वारा जांच जरूरी बताई गई है। हाईकोर्ट ने अत्यधिक उत्साह में किए गए निर्वासन को न्यायिक माहौल के लिए हानिकारक बताया था।
तुषार मेहता ने मीडिया रिपोर्ट पर जताई आपत्ति
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट को टैब्लॉयड जैसी बताकर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि कुछ हिस्सों में एक विशेष नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की जा रही है। मेहता ने कहा, मुझे पता है कि अदालत प्रभावित नहीं होती, लेकिन ऐसे प्रयासों की मंशा चिंता पैदा करती है। विश्वास डगमगाता है। जस्टिस बागची ने स्पष्ट कहा, हम पब्लिसिटी और छद्म-पब्लिसिटी स्टंट से पूरी तरह अप्रभावित हैं। नैरेटिव किसी व्यक्ति के जीवन को प्रभावित नहीं करने चाहिए। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, विचाराधीन न्यायिक मामलों पर आधे-अधूरे और विकृत तथ्य नहीं परोसे जाने चाहिए। सुनवाई की तारीख बताना ठीक है, लेकिन राय थोपना समस्या है। ऐसी रिपोर्टिंग जनमानस को गुमराह करती है।
पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि प्रवासन आज वैश्विक बहस का मुद्दा है और अमेरिका-इंग्लैंड में भी इस पर मीडिया में चर्चा होती है। उन्होंने कहा, जब तक आप किसी पर मंशा नहीं थोपते, राय रखना कोई अपराध नहीं है।
वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने एक और निर्वासित महिला, स्वीटी बीबी का मामला उठाया, जो अपने पति और दो बच्चों के साथ सीमा पार फंसी हुई हैं। उन्होंने भारतीय नागरिकता से जुड़े दस्तावेज सौंपने की पेशकश की और मानवीय आधार पर मदद मांगी। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि वे मामले की जांच करेंगे, लेकिन सत्यापन में समय लगेगा।