सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कहा है कि निजी मेडिकल कॉलेजों में फीस तार्किक होनी चाहिए न कि मुनाफाखोरी व शोषण करने वाली। कोर्ट ने कहा कि यह दाखिला व फीस नियंत्रण समिति को सुनिश्चित करना चाहिए।
जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस एस रवींद्र भट्ट की पीठ ने कहा है कि प्राइवेट सेल्फ फाइनेंसिंग मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस छात्रों की फीस पर नियंत्रण, दाखिला व फीस नियामक कमेटी के अधिकार क्षेत्र में है। ऐसे में समिति को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि फीस तार्किक हो और यह शोषण करने वाली न हो।
समिति कॉलेज प्रबंधन से वह तमाम जानकारी ले सकती है जिससे वह इस नतीजे पर पहुंच सके कि प्रस्तावित फीस तार्किक हो। केरल सरकार ने हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी जिसमें समिति को ऑडिट शीट का परीक्षण सिर्फ इस पर विचार करने के लिए कहा गया था कि कॉलेज प्रबंधन ने जो व्यय का ब्योरा दिया है, उसे शामिल किया जाना चाहिए या नहीं।
राज्य सरकार का कहना था कि हाईकोर्ट का आदेश प्रावधानों के विपरीत है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की दलीलों पर सहमति जताई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि फीस निर्धारण में देरी न तो संस्थान के हित में है और न ही छात्रों के।
लिहाजा पीठ ने समिति को प्राइवेट सेल्फ फाइनेंसिंग मेडिकल कॉलेजों के फीस निर्धारण के प्रस्ताव पर जल्द निर्णय लेने के लिए कहा है। फीस का निर्धारण वर्ष 2017-2018 के बाद से होगा।