सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी परीक्षा में दिव्यांग (बेंचमार्क) अभ्यर्थियों के लिए कट ऑफ अंक का खुलासा न करना न तो मनमाना है और न ही मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। अदालत ने कहा कि ऐसे उम्मीदवार क्षैतिज आरक्षण की श्रेणी में आते हैं।
जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि निर्विवाद रूप से दिव्यांग व्यक्तियों के लिए आरक्षण को क्षैतिज आरक्षण यानी संविधान के अनुच्छेद 16 के खंड (1) के तहत आरक्षण माना गया है। यह ऊर्ध्वाधर आरक्षण यानी अनुच्छेद 16 के खंड (4) के तहत आरक्षण नहीं माना जाता है।
वर्ष 1992 के इंद्रा साहनी (मंडल आयोग मामले) में दिए गए स्पष्टीकरण के मद्देनजर पीठ ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि दिव्यांग कोटे के तहत चुने गए व्यक्तियों को उचित श्रेणी में रखा जाएगा, यानी यदि वह अनुसूचित श्रेणी से संबंधित है तो उसे उस श्रेणी में रखा जाएगा और यदि वह खुली श्रेणी से संबंधित है तो खुली श्रेणी में आवश्यक समायोजन किया जाएगा।
अनिल कुमार गुप्ता और अन्य बनाम यूपी राज्य (1995) के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए पीठ ने कहा कि विशेष आरक्षण को ऊर्ध्वाधर (सामाजिक) आरक्षण श्रेणियों में आनुपातिक रूप से विभाजित नहीं किया जा सकता है। विशेष आरक्षण श्रेणियों के लिए पात्र उम्मीदवारों को उनके लिए आरक्षित समग्र सीटें प्रदान की जानी चाहिए।
शीर्ष अदालत ने रेखा शर्मा और रतन लाल की अपीलों को खारिज कर दिया, जिन्होंने राजस्थान में सिविल जज के पद के लिए आवेदन किया था, लेकिन वे दिव्यांग व्यक्तियों के लिए कट ऑफ अंक का खुलासा न करने के अथॉरिटी के निर्णय से व्यथित थे।
पीठ ने कहा, अन्य श्रेणियों के लिए कट ऑफ अंक निर्धारित करना और दिव्यांग व्यक्तियों की श्रेणी के लिए कट ऑफ अंक निर्धारित नहीं करने को न तो मनमाना कहा जा सकता है और न ही यह अपीलकर्ताओं के किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
विज्ञापन का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि महिला उम्मीदवारों के मामले में रिक्तियों को प्रत्येक श्रेणी यानी सामान्य, ओबीसी, एससी, एसटी, एमबीसी के लिए वर्गीकृत या पहचाना गया था, जबकि दिव्यांग व्यक्तियों के लिए उक्त श्रेणियों में ऐसी कोई रिक्तियों का उल्लेख नहीं किया गया था।