सुप्रीम कोर्ट ने बिजली टैरिफ से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि उपभोक्ताओं से ऐसी सेवा के लिए भुगतान नहीं कराया जा सकता, जो उन्हें अब मिल ही नहीं रही हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि टैरिफ निर्धारण केवल गणितीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि उपभोक्ता हितों और कंपनियों की लागत के बीच संतुलन बनाने का विषय है। न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ ने दिल्ली बिजली नियामक आयोग (DERC) की अपील पर यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने फरवरी 2025 में अपीलेट ट्रिब्यूनल फॉर इलेक्ट्रिसिटी (APTEL) द्वारा दिए गए आदेश को रद्द कर दिया।
क्या था पूरा मामला?
यह विवाद दिल्ली के रिठाला स्थित गैस आधारित 108 मेगावाट क्षमता वाले रिठाला कंबाइंड साइकिल पावर प्लांट से जुड़ा था। इस परियोजना को वर्ष 2010 में आयोजित 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले दिल्ली में बिजली आपूर्ति बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड (TPDDL) ने सीमित अवधि के लिए इस प्लांट को संचालित करने का प्रस्ताव दिया था। पावर परचेज एग्रीमेंट (PPA) के अनुसार बिजली आपूर्ति केवल छह वर्षों तक की जानी थी, जो मार्च 2018 तक प्रभावी रही।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बिजली अधिनियम 2003 की धारा 61 के तहत टैरिफ तय करते समय उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। अदालत ने कहा "उपभोक्ताओं को ऐसी सेवा के लिए भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, जो उन्हें अब प्राप्त नहीं हो रही है।" कोर्ट ने माना कि मार्च 2018 के बाद प्लांट से उपभोक्ताओं को बिजली आपूर्ति बंद हो चुकी थी। ऐसे में बिजली कंपनियों को पूरे 15 वर्षों की लागत उपभोक्ताओं पर डालने की अनुमति देना उचित नहीं होगा।
DERC और APTEL के फैसले में क्या अंतर था?
DERC ने नवंबर 2019 में केवल वित्त वर्ष 2017-18 तक 6 प्रतिशत वार्षिक दर से मूल्यह्रास (Depreciation) की अनुमति दी थी। आयोग ने लगभग 83.34 करोड़ रुपये की लागत को मान्यता दी, लेकिन बाकी करीब 94.59 करोड़ रुपये उपभोक्ताओं पर डालने से इनकार कर दिया। इसके विपरीत, APTEL ने फरवरी 2025 में कहा था कि चूंकि प्लांट की उपयोगी आयु 15 वर्ष तय की गई थी, इसलिए पूरी पूंजी लागत की वसूली 15 वर्षों में की जानी चाहिए।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने DERC के निर्णय को सही ठहराते हुए कहा कि PPA केवल छह वर्षों के लिए मान्य था और TPDDL ने 2017 के आदेश को कभी चुनौती भी नहीं दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिजली टैरिफ निर्धारण में केवल कंपनियों की लागत वसूली को नहीं देखा जा सकता। नियामक संस्थाओं का दायित्व है कि वे उपभोक्ताओं को अनावश्यक आर्थिक बोझ से बचाएं।
अन्य वीडियो:-