जानिए क्या है 2018 का जोसेफ शाइन मामला
2018 में जोसेफ शाइन ने धारा 32 के तहत सीआरपीसी की धारा 198 के साथ पठित आईपीसी की धारा 497 की संवैधानिकता को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका दायर की थी। जिसमें कहा गया था कि अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन हुआ है। यह पहली बार व्यभिचार के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका थी।
याचिकाकर्ता ने व्यभिचार के प्रावधान को मनमाना और जेंडर के आधार पर भेदभावपूर्ण होने का दावा किया था। सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने व्यभिचार को अपराध मानना असंवैधानिक करार दिया था। हालांकि, भारत में हिंदू विवाह अधिनियम 1956 की धारा 13 (1) के तहत व्यभिचार तलाक का आधार है।
'अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए होना चाहिए तंत्र'
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल सितंबर माह में कहा था कि सशस्त्र बलों के पास व्यभिचार के आरोप में अपने अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही के लिए किसी प्रकार का तंत्र होना चाहिए, क्योंकि यह ऐसा आचरण है जो अधिकारियों के जीवन बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।
शीर्ष अदालत ने कहा था कि व्यभिचार एक परिवार को पीड़ा देता है और इसे हल्के तरीके से नहीं लेना चाहिए। सैन्य सेवाओं में अनुशासन सर्वोपरि है। हर कोई अंततः समाज की एक इकाई के रूप में परिवार पर निर्भर है। समाज की अखंडता एक पति या पत्नी की एक-दूसरे के प्रति वफादारी पर आधारित है।