सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी मामले में वकील के जरिये प्रतिनिधित्व कराने का अधिकार कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। अगर वकील किसी कारण से उपलब्ध नहीं है तो अदालत अपनी सहायता के लिए एमीकस क्यूरी नियुक्त करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन किसी मामले में ऐसा नहीं होना चाहिए कि मामले का प्रतिनिधित्व नहीं हो रहा हो।
कोर्ट ने यह टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए की। हाईकोर्ट ने 1987 हत्या मामले में आरोपी की याचिका इस आधार पर खारिज कर दी थी कि उसका वकील सुनवाई के दौरान मौजूद नहीं था। कोर्ट ने याचिका बहाल करते हुए हाईकोर्ट से जल्द से जल्द इस पर सुनवाई करने के लिए विचार करने को कहा।
जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि यह स्वीकार्य है कि वकील के जरिये प्रतिनिधित्व का अधिकार कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत यह गारंटी संदर्भित है। हाईकोर्ट ने वकील की अनुपस्थिति में निचली अदालत के नजरिये को सही ठहराया। ऐसी परिस्थिति में हमारे पास हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करने और आपराधिक अपील को बहाल करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
हाईकोर्ट नए सिरे से इसका निपटारा करे। हम हाईकोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश देते हैं कि अपील को निर्देशों के लिए 11 जनवरी, 2021 को उचित अदालत के समक्ष सूचीबद्ध करें। हाईकोर्ट में अपील लंबित रहने तक अपीलकर्ता को हिरासत में रखा जा सकता है। हाईकोर्ट ने हत्या के मामले में दोषी को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के निचली अदालत के फैसले के खिलाफ उसकी अपील खारिज कर दी थी।