सीबीआई ने मुताबिक, 2003 मे भ्रष्टाचार विरोधी शाखा के समक्ष एक शिकायत दर्ज कर दावा किया गया था कि अपीलकर्ता ने शिकायतकर्ता को कंप्यूटरीकृत रेलवे आरक्षण टिकट के बिक्री रैकेट के झूठे मामले में न फंसाने के एवज में रिश्वत मांगी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कहा है कि हाईकोर्ट को ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले को तब ही पलटना चाहिए जब ट्रायल कोर्ट का दृष्टिकोण न केवल गलत हो बल्कि अनुचित और विकृत भी हो। जस्टिस विनीत शरण और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर एक आपराधिक अपील का निपटारा करते हुए यह टिप्पणी की जिसमें ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले को पलट दिया गया था। हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराधों के लि दोषी ठहराया था।
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पीठ ने कहा, ट्रायल कोर्ट का विचार एक संभावित दृष्टिकोण था जो न तो विकृत है और न ही अनुचित था। वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर गौर किया जाए तो हाईकोर्ट को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था। इस मामले में वर्तमान अपीलकर्ता एक लोक सेवक था। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए अपीलकर्ता को एक वर्ष की अवधि के कारावास और 5000 रुपये का जुर्माना लगाया था। हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता सुमन चंद्रा को आपराधिक कदाचार, रिश्वत लेने समेत भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अपराधों के लिए दोषी ठहराया था।
सीबीआई ने मुताबिक, 2003 मे भ्रष्टाचार विरोधी शाखा के समक्ष एक शिकायत दर्ज कर दावा किया गया था कि अपीलकर्ता ने शिकायतकर्ता को कंप्यूटरीकृत रेलवे आरक्षण टिकट के बिक्री रैकेट के झूठे मामले में न फंसाने के एवज में रिश्वत मांगी थी। हालांकि वह रिश्वत देने के लिए तैयार नहीं हुआ। उनके द्वारा दर्ज कराई गई लिखित शिकायत के आधार पर सीबीआई ने जाल बिछाया और अपीलकर्ता को रिश्वत की रकम के साथ गिरफ्तार किया था।