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सुप्रीम कोर्ट ने कहा: अभिव्यक्ति की आजादी को आपराधिक मामले थोपकर नहीं दबा सकते

Fri, 26 Mar 2021 04:38 AM IST
Jeet Kumar एजेंसी, नई दिल्ली।

सार

  • सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की पत्रकार पर एफआईआर
  • कहा, सरकार के कामकाज से नाखुशी जताना भड़काऊ भाषण नहीं
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कहा, देश में किसी भी नागरिक की अभिव्यक्ति की आजादी को आपराधिक मामले थोपकर नहीं दबा सकते। यह कहते हुए शीर्ष अदालत ने पत्रकार पैट्रीशिया मुखीम के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द कर दी है। द शिलांग टाइम्स की संपादक और वरिष्ठ पत्रकार पैट्रीशिया पर फेसबुक पोस्ट से सांप्रदायिक दंगे फैलाने के आरोप हैं। 

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जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस एस रवींद्र भट की पीठ ने कहा, मुखीम ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में मेघालय में रहने वाले गैर आदिवासियों की सुरक्षा और उनकी समानता के लिए जो तर्क दिए हैं, उसे भड़काऊ भाषण नहीं माना जा सकता है।

मुखीम की फेसबुक पोस्ट को भड़काऊ भाषण के दायरे में नहीं रखा जा सकता है। फैसला लिखने वाले जस्टिस राव ने कहा, सरकार के कामकाज से नाखुशी जाहिर करने को विभिन्न समुदायों के बीच नफरत को बढ़ावा देने के प्रयास के रूप में ब्रांड नहीं बनाया जा सकता है।
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पीठ ने कहा, भारत एक बहुसांस्कृतिक समाज है, जहां स्वतंत्रता का वादा संविधान की प्रस्तावना में दिया गया। अभिव्यक्ति की आजादी, घूमने की आजादी और भारत में कहीं भी बसने समेत हर नागरिक के अधिकारों को कई प्रावधानों में बयां किया गया है।

कोर्ट ने मुखीम की मेघालय हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दी गई याचिका को मंजूरी दे दी, जिसमें उसने एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने 16 फरवरी को अपना फैसला सुरक्षित रखा था। 

ऐसा तभी जब राज्य पीड़ितों के प्रति अपनी आंखें मूंद लेते हैं
कोर्ट ने कहा, ऐसे मामलों में जब राज्य प्रशासन पीड़ितों के प्रति अपनी आंखें मूंद लेते हैं या फिर उनकी असंतोष की आवाजों को दबा देते हैं, तो यही नाराजगी बन जाती है। ऐसे में या तो इंसाफ नहीं मिलता है या फिर न्याय मिलने में देरी होती है। इस मामले में ऐसा ही प्रतीत होता है।

तीन जुलाई, 2020 का था मामला
इससे पहले मुखीम के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि तीन जुलाई, 2020 को एक जानलेवा हमले से जुड़ी घटना के संबंध में किए गए पोस्ट के जरिए वैमनस्य या संघर्ष पैदा करने का कोई इरादा नहीं था।

पिछले साल 10 नवंबर को मेघालय हाईकोर्ट की एकल पीठ ने एक पारंपरिक संस्थान लॉसोहतुन दरबार शोन्ग द्वारा दायर प्राथमिकी रद्द करने से इनकार कर दिया था। मुखीम ने एक बास्केटबॉल कोर्ट में पांच लड़कों पर हमले के बाद जानलेवा हमला करने वाले लोगों की पहचान करने में नाकाम रहने के लिए फेसबुक पर लॉसोहतुन गांव की परिषद ‘दरबार’ पर निशाना साधा था।

‘दरबार’ या ‘दोरबार शोन्ग’ खासी जनजातियों के गांवों की प्रशासनिक इकाई है, जो पारंपरिक शासन चलाती है। इस घटना में कथित रूप से दो समूह आदिवासी एवं गैर आदिवासी शामिल थे। मामले में 11 लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया था और दो लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

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