सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले चुनाव आयोग की मतदाता सूची को फ्रीज करने को चुनौती देने वाली लंबित याचिकाओं के साथ एक नई याचिका पर 13 अप्रैल को सुनवाई करने की सहमति दी। चुनाव आयोग ने पहले चरण में मतदान के लिए विधानसभा सीटों की मतदाता सूची को 9 अप्रैल को फ्रीज और अंतिम रूप दे दिया था। जेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ के समक्ष एक वकील ने मतदाता सूची पर रोक लगाने के खिलाफ याचिका पर तत्काल सुनवाई करने का आग्रह किया। वकील ने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ कई अपीलें अभी भी लंबित हैं और चुनाव आयोग ने 9 अप्रैल को मतदाता सूची पर रोक लगा दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न मुद्दों पर 25 अलग-अलग जनहित याचिकाएं दायर करने वाले एक अधिवक्ता से शुक्रवार को कहा कि उन्हें अदालत का रुख करने से पहले संबंधित प्राधिकरणों के पास जाना चाहिए। जैसे ही मामले की सुनवाई शुरू हुई, याचिकाकर्ता के रूप में स्वयं पेश हुए अधिवक्ता सचिन गुप्ता ने सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की पीठ से कहा कि वह अपनी सभी जनहित याचिकाएं वापस लेना चाहते हैं। पीठ ने गुप्ता से कहा, आप अपने पेशे पर ध्यान दें। आपको सीधे अदालत का दरवाजा खटखटाने के बजाय संबंधित प्राधिकरणों के पास जाना चाहिए और उन्हें विभिन्न मुद्दों पर जानकारी देनी चाहिए। पीठ ने कहा कि उचित समय आने पर यदि आवश्यकता हुई, तो न्यायालय उनकी याचिकाओं पर विचार भी करेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने जाति जनगणना पर रोक लगाने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया और याचिका में इस्तेमाल की गई भाषा पर कड़ी नाराजगी जताई। सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता को फटकार लगाते हुए कहा कि याचिका में असभ्य और आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया गया है। जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल थे, ने याचिकाकर्ता से कहा, आपने अपनी याचिका में बदतमीजी की भाषा लिखी है। आपने यह याचिका किससे लिखवाई है? अदालत ने आगे कहा, आप इस तरह की भाषा याचिका में कहां से लिखते हैं? पीठ ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार की भाषा न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा के अनुरूप नहीं है। अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए किसी भी प्रकार का निर्देश देने से इन्कार कर दिया।
इस याचिका में केंद्र सरकार को जाति जनगणना रोकने का निर्देश देने की मांग की गई थी। साथ ही याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की थी कि एक बच्चे वाले परिवारों को आर्थिक प्रोत्साहन देने के लिए नीति बनाई जाए। सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिका के तथ्यों पर विचार करने के बजाय पहले उसके प्रस्तुतिकरण और भाषा पर गंभीर आपत्ति जताई और कहा कि अदालत में दायर दस्तावेजों में मर्यादा और शालीनता का पालन जरूरी है।
2027 की जनगणना से जुड़ी पीआईएल से भी इन्कार
इससे पहले 2 फरवरी को भी सुप्रीम कोर्ट ने 2027 की जनगणना में जाति संबंधी आंकड़ों को दर्ज करने, उनके वर्गीकरण और सत्यापन की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली एक अन्य जनहित याचिका पर सुनवाई से इन्कार कर दिया था। वर्ष 2027 में होने वाली जनगणना देश की 16वीं राष्ट्रीय जनगणना होगी। इसमें 1931 के बाद पहली बार व्यापक स्तर पर जाति आधारित गणना शामिल किए जाने की योजना है। यह देश की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना भी होगी, जिसमें आंकड़ों के संग्रह और प्रबंधन के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जाएगा।