सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि जब यह महसूस होता है कि लोक अदालत के फैसले के खिलाफ अपील दायर करना जरूरी है। खासकर जब आशंका हो कि धोखाधड़ी से फैसले को प्रभावित किया गया है, फिर भी रिट कोर्ट लोक अदालत के फैसले को नजरअंदाज नहीं कर सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि तथ्यों को जांचे बिना लोक अदालत के फैसले को बदला या रद्द नहीं किया जा सकता। लोक अदालत विवादों के निपटारे का वैकल्पिक माध्यम हैं। यह फोरम विभिन्न अदालतों में लंबित या दायर होने वाले मामलों को सौहार्दपूर्वक निपटाता है।
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सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि जब यह महसूस होता है कि लोक अदालत के फैसले के खिलाफ अपील दायर करना जरूरी है। खासकर जब आशंका हो कि धोखाधड़ी से फैसले को प्रभावित किया गया है, फिर भी रिट कोर्ट लोक अदालत के फैसले को नजरअंदाज नहीं कर सकती।
जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने यह आदेश कर्नाटक हाईकोर्ट के 2015 के उस फैसले पर दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने वर्ष 2012 के लोक अदालत के आदेश को वापस ले लिया था, इसमें दोनों पक्षों के बीच समझौता कराया गया था। उच्च न्यायालय के फैसले को निरस्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा लोक अदालत के फैसले को निरस्त करके और बिना विचार-विमर्श के फैसले पर पहुंचने को कायम नहीं रखा जा सकता।
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सर्वोच्च कोर्ट ने कहा इस मामले में हाईकोर्ट का फैसला उस कानून के सिद्धांत के विपरीत है, जिसके तहत दोनों पक्षों में आम सहमति या समझौतों के माध्यम से आदेशों की पवित्रता और अंतिमता की रक्षा की जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने विधिक सेवा प्राधिकरण की धारा-21 का जिक्र करते हुए कहा इसके तहत लोक अदालत के आदेश को सिविल अदालत के बराबर माना जाता है।