सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आधार की मांग पूरी नहीं करने या बायोमेट्रिक से पहचान नहीं होने की स्थिति में लाभ से वंचित किए जाने के कारण किसी कानून को असंवैधानिक करार नहीं किया जा सकता।
पश्चिम बंगाल सरकार की याचिका पर अंतरिम आदेश पारित करने से इनकार
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने यह टिप्पणी पश्चिम बंगाल सरकार की उस याचिका पर की जिसमें कहा गया कि आधार न होने या बायोमेट्रिक्स से पहचान न होने की स्थिति में किसी व्यक्ति को सरकारी लाभ से महरूम नहीं रखा जा सकता। पीठ ने कहा कि इस आधार पर किसी कानून को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता।
इससे पहले याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने न्यूज रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि आधार न होने के कारण कुछ बुजुर्गों को पेंशन नहीं मिल पा रही है। लिहाजा कोई अंतरिम आदेश पारित किया जाना चाहिए। वहीं केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल और यूआईडीएआई की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सिब्बल की इस दलील का विरोध किया। उन्होंने कहा कि बायोमेट्रिक्स फेल होने की स्थिति में वैकल्पिक पहचान दिखाने पर सरकारी लाभकारी योजनाओं का लाभ लिया जा सकता है।
इस पर पीठ ने कहा कि यह दर्शाता है कि यह परेशानी देशभर में है। लेकिन सवाल है कि जब तक प्रभावी तंत्र विकसित नहीं कर लिया जाता तब तक किसी भी व्यक्ति को लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। हालांकि पीठ ने यह भी कहा कि 1.2 अरब लोग आधार के लिए पंजीकरण करा चुके हैं, यानी अब 10 करोड़ लोग ही बचे हैं। अगर इतनी परेशानी है तो आखिर इतने लोग कैसे पंजीकरण करा सकते हैं।