घरेलू हिंसा से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के बीच हुए समझौते से उस बालिग बेटी के मौद्रिक अधिकार खत्म नहीं हो सकते, जो उस समझौते की पक्षकार ही नहीं थी। अदालत ने कहा कि बेटी को अपने अधिकारों के लिए कानून के मुताबिक नए सिरे से कार्यवाही करने की छूट है।
घरेलू हिंसा कानून के तहत शुरू की गई कार्यवाही
जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने ये टिप्पणी उस मामले में की है जिसमें पति-पत्नी के बीच हुए समझौते के बाद घरेलू हिंसा कानून के तहत शुरू की गई कार्यवाही से जुड़ा था। पत्नी ने पति के साथ समझौते में भविष्य में किसी भी मौद्रिक दावे और भरणपोषण की मांग नहीं करने पर सहमति जताई थी। इसके बाद दोनों ने आपसी सहमति से तलाक ले लिया था।
बेटी बालिग थी, लेकिन वह समझौते की पक्षकार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से नोट किया कि समझौता सिर्फ पति और पत्नी के बीच हुआ था। उस समय बेटी बालिग थी, लेकिन वह समझौते की पक्षकार नहीं थी। इसलिए अदालत ने कहा कि बेटी के बारे में यह नहीं माना जा सकता कि उसने अपने मौद्रिक दावों का त्याग कर दिया था।