सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को DMK को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय की करूर भगदड़ पीड़ितों के परिवारों से निर्धारित मुलाकात पर सवाल उठाने के लिए फटकार लगाई। अदालत ने DMK की उस याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि राज्य के मंत्री मामले में गवाहों को प्रभावित कर रहे हैं। न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की खंडपीठ ने DMK से पूछा कि अदालत कार्यपालिका प्रमुख के दौरे को कैसे विनियमित कर सकती है। पीठ ने DMK के वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार से पूछा कि भगदड़ पीड़ितों से मिलना गवाहों को प्रभावित करने जैसा कैसे है।
किस मामले में याचिका वापस ली गई?
मुख्यमंत्री विजय 10 जुलाई को भगदड़ पीड़ितों के परिवारों से मिलने वाले हैं। अदालत ने कुमार से कहा कि DMK अपनी याचिका वापस ले सकती है और कानून के तहत कोई अन्य उपाय अपना सकती है, अन्यथा अदालत इसे खारिज कर देगी। कुमार ने किसी अन्य मंच पर जाने की स्वतंत्रता के साथ याचिका वापस लेने पर सहमति व्यक्त की। शीर्ष अदालत ने याचिका को वापस लिया हुआ मानकर खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट में किसने दायर की थी याचिका?
DMK सचिव आर एस भारती ने यह याचिका दायर की थी। इसमें तमिलनाडु के मुख्यमंत्री, राज्य मंत्री आधाव अर्जुन और अन्य आरोपियों को मामले पर सार्वजनिक बयान देने से रोकने की मांग की गई थी। साथ ही, CBI जांच लंबित रहने के दौरान पीड़ितों के परिवारों के साथ उनकी बातचीत को विनियमित करने की भी मांग की गई थी। याचिका में उन रिपोर्टों का उल्लेख किया गया था कि मुख्यमंत्री करूर का दौरा कर मृतक और घायल पीड़ितों के परिवारों को सरकारी आदेश, अनुकंपा नियुक्तियां और अन्य लाभ वितरित करने वाले हैं। भारती ने एक लंबित मामले में हस्तक्षेप की अपील की थी। उन्होंने कोर्ट से कहा, 2026 के विधानसभा चुनावों के बाद मामले में शुरू में आरोपपत्रित कई लोग अब तमिलनाडु मंत्रिमंडल में मंत्री हैं। पिछले साल 13 अक्तूबर को शीर्ष अदालत ने भगदड़ की CBI जांच का आदेश दिया था, जिसमें 41 लोग मारे गए थे। अदालत ने कहा था कि इस घटना ने राष्ट्रीय अंतरात्मा को झकझोर दिया था और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता थी।
सुप्रीम कोर्ट: वकीलों को लापरवाही के लिए काली सूची में नहीं शामिल कर सकते बैंक
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बैंक और इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (आईबीए) वकीलों को सिर्फ पेशेवर लापरवाही के आरोपों के आधार पर कॉशन लिस्ट (सावधानी सूची) में नहीं डाल सकते। कानूनी पेशे की आजादी को मजबूत करते हुए, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा, वकीलों को काली सूची में डालना बार काउंसिल के कानूनी अनुशासनात्मक अधिकार क्षेत्र में अनुचित दखल है।
पीठ ने कहा, हम बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) को निर्देश देते हैं कि वह वकीलों के लिए नेशनल लीगल एकेडमी स्थापित करने पर विचार-विमर्श करने और उसे विकसित करने के लिए सीनियर और जूनियर वकीलों के साथ-साथ शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने के क्षेत्र के विशेषज्ञों की एक टीम बनाए। पीठ ने कहा, हमें उम्मीद है कि बीसीआई इस जिम्मेदारी को निभाएगी, इन सभी मुद्दों पर विचार करेगी और अपने फैसले के बारे में कोर्ट को सूचित करेगी। शीर्ष कोर्ट के इस फैसले में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा के दायरे को स्पष्ट किया गया और कहा गया कि आईबीए के खिलाफ रिट याचिकाएं दायर की जा सकती हैं, क्योंकि अब यह अनुच्छेद केवल अनुच्छेद 12 के दायरे में आने वाले वैधानिक प्राधिकरणों या राज्य की संस्थाओं तक सीमित नहीं है और इसमें दिए गए ‘किसी भी व्यक्ति या प्राधिकरण’ वाक्यांश की लगातार व्यापक और अधिक उदार व्याख्या की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस नजरिये को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि रिट याचिका स्वीकार्य नहीं है क्योंकि आईबीए अनुच्छेद 12 के तहत राज्य नहीं है।
वकीलों के खिलाफ शिकायत हो तो बार काउंसिल से करें
पीठ ने कहा, अपीलकर्ता वकील पर पेशेवर लापरवाही या गलत आचरण के जो आरोप लगाए गए हैं, अगर वे सच भी हों, तो भी वे एडवोकेट्स एक्ट के तहत अनुशासनात्मक अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। अदालत ने कहा, अगर बैंक को लगता है कि वकील के तौर पर कानूनी जिम्मेदारियां निभाते हुए अपीलकर्ता वकील ने पेशेवर लापरवाही या गलत आचरण किया है, तो सही तरीका यह है कि संबंधित जानकारी और सबूत सक्षम राज्य बार काउंसिल के सामने रखे जाएं।