याचिका में कहा गया है कि 2007-2019 के दौरान नक्सल प्रभावित बस्तर जिले में तैनात 148 सीएपीएफ कर्मियों ने खुदकुशी की, लेकिन अशांत क्षेत्रों में तैनात कर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य का आकलन करने के लिए कोई अध्ययन नहीं कराया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया जिसमें केंद्र और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) को उनके कर्मियों को समय-समय पर मानसिक स्वास्थ्य आकलन करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। इसके जरिये यह सुनिश्चित किया जाना था कि उन्हें ड्यूटी के लिए न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी फिट बनाना था।
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जस्टिस एस अब्दुल नजीर की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ताओं को संबंधित प्राधिकारी से संपर्क करने की स्वतंत्रता दे दी। साथ ही प्राधिकारी से कहा कि जब भी याचिका या आवेदन दायर किया जाएं, तो वह इस पर शीघ्रता से निर्णय ले। सीआरपीएफ से सेवानिवृत्त सब इंस्पेक्टर महावीर सिंह और टी उन्नीकृष्णन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सीयू सिंह ने दलील दी कि सीएपीएफ में आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं और कोई काउंसलिंग की सेवा उपलब्ध नहीं है और न ही मनोरोग देखभाल ही उपलब्ध है। इस पर पीठ ने पूछा कि क्या याचिकाकर्ताओं ने संबंधित प्राधिकरण के समक्ष कोई आवेदन दिया है।
2007-19 के बीच बस्तर में 148 जवानों ने की खुदकुशी
याचिका में कहा गया है कि 2007-2019 के दौरान नक्सल प्रभावित बस्तर जिले में तैनात 148 सीएपीएफ कर्मियों ने खुदकुशी की, लेकिन अशांत क्षेत्रों में तैनात कर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य का आकलन करने के लिए कोई अध्ययन नहीं कराया गया। पिछले साल अगस्त में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने राज्यसभा में कहा था कि पिछले छह साल में 680 जवानों ने खुदकुशी की। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के हवाले से याचिकाकर्ताओं ने कहा कि 2014 से 2019 के दौरान 439 सीएपीएफ जवानों ने आत्महत्या की जबकि 220 सीएपीएफ जवान ड्यूटी के दौरान मारे गए।