सुप्रीम कोर्ट ने दो दशक पहले दिए अपने उस फैसले पर पुन:समीक्षा करने से इनकार कर दिया है जिसमें कहा गया था कि किसी दल का कोई निर्वाचित सदस्य निष्कासन के बाद भी पार्टी के कंट्रोल में होता है और वह व्हिप मानने के लिए बाध्य है।
सुप्रीम कोर्ट को इस पर अपना निर्णय देना था कि क्या दल से निष्कासन केबाद अगर कोई पार्टी के व्हिप नहीं मानता है तो क्या उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है? सांसद अमर सिंह और पूर्व सांसद जया प्रदा की याचिका का निपटारा करते हुए न्यायमूर्ति रंजन गोगई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि हमने इस मसले पर विस्तार से सुनवाई की लेकिन हम इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे रहे हैं। पीठ ने कहा कि चूंकि अमर सिंह और जया प्रदा का कार्यकाल पूरा हो चुका है, लिहाजा इस प्रश्न का जवाब देना उचित नहीं होगा।
मालूम हो कि वर्ष 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने अपन फैसले में दल-बदल कानून की व्याख्या करते हुए कहा था कि किसी राजनीतिक दल का उसके निर्वाचित सदस्यों पर निष्कासन केबाद भी अधिकार होता है। अमर सिंह और जया प्रदा ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी अयोग्यता की आशंका के मद्देनजर अर्जी दाखिल कर उस पर रोक की मांग की थी।
दोनों को पार्टी से निलंबित किया गया था और उसके बाद पार्टी ने व्हिप जारी कर महिला आरक्षण विधेयक के दौरान पार्टी के रुख के अनुरूप वोटिंग के लिए कहा गया था। इन दोनों ने पार्टी के व्हिप के खिलाफ आरक्षण के पक्ष में वोट डालने की स्थिति में उनके अयोग्य ठहराए जाने के अंदेशे के तहत अर्जी दाखिल की थी।
इन दोनों की दलील थी कि इन दोनों को पार्टी से निष्कासित किया जा चुका है ऐसे में इन पर पार्टी व्हिप मानना उनकेलिए बाध्यकारी नहीं है। उनका कहना था कि दल बदल कानून इन पर लागू नहीं होता। साथ ही उनका कहना था कि यह उनकेमूल अधिकारों का हनन है।