कोर्ट ने याचीगण के वकील से कहा कि अगर वे उन्हें राहत देते हैं तो उनके बाद आने वाले बैच के अधिकारियों को भी यह राहत देनी होगी। इसका गंभीर असर होगा। ऐसे में याचिका वापस लेकर स्थाई कमीशन के लिए बने बोर्ड के अधिकारियों के आवेदन पर निर्णय का इंतजार करें। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि इस मामले पर निर्णय करना मुश्किल काम है। यह महिला सैन्य अधिकारी देश की सेवा में लगी हैं, हम उनके लिए कुछ करना चाहते हैं, लेकिन कहीं तो सीमा तय करनी होगी।
मामले की पृष्ठभूमि
17 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में महिला सैन्य अधिकारियों को स्थाई कमीशन और कमान पोस्टिंग देने के निर्देश दिए थे। उसने लैंगिक रूढ़िवादिता और महिलाओं से भेदभाव पर आधारित केंद्र सरकार के महिला अधिकारियों की शारीरिक सीमा के तर्क को नकारा था। केंद्र द्वारा 25 फरवरी 2019 को सेना की 10 शाखाओं में एसएससी की महिला सैन्य अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने के लिए बनाई नीति को कोर्ट ने स्वीकार करते हुए कहा था कि स्थायी कमीशन का विकल्प सभी महिला अधिकारियों को दिया जाएगा।
अगर वे इसे नहीं लेती हैं, तो जिन अधिकारियों ने 14 वर्ष की सेवा पूरी कर ली है, उन्हें 20 वर्ष की पेंशन योग्य सेवा जारी रखने का पात्र माना जाए। 20 वर्ष से अधिक सेवा पूरी कर चुकी अधिकारी, जिन्हें स्थायी कमीशन नहीं दिया गया, वे नीतिगत निर्णय के तहत पेंशन पर सेवानिवृत्त होंगी।
उस समय भारतीय सेना में अधिकारियों के 50,266 पद थे, जिनमें से 9,441 खाली थे। वहीं 1,653 महिला सैन्य अधिकारी थीं, जो कुल सैन्य अधिकारियों का चार प्रतिशत से भी कम है। इनमें 77 ने 20 वर्ष से अधिक सेवा की थी, 255 का सेवाकाल 14 से 20 वर्ष के बीच था।