सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुत्व को नए सिरे से परिभाषित करने से इनकार करते हुए मंगलवार को कहा कि अब वह इस मुकाम पर इस धर्म की पुनर्समीक्षा नहीं करेगा। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह न तो 1995 के चर्चित हिंदुत्व के फैसले पर पुनर्विचार करेगी और न ही धर्म और हिंदुत्व के पहलू की व्याख्या करेगी।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर सहित सात सदस्यीय जजों की पीठ ने कहा, ‘हम बड़ी बहस में नहीं जाना चाहेंगे कि हिंदुत्व क्या है और इसके मायने क्या हैं। हम अपने 21 वर्ष पुराने फैसले पर भी पुनर्विचार नहीं करेंगे। हम सिर्फ इस फैसले को संदर्भ के तौर पर पेश किए जाने वाले मामले की ही सुनवाई करेंगे। फिलहाल हमारे पास जो मामला है, हम इसी के दायरे में रहना चाहते हैं।’ इक्कीस वर्ष पूर्व पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा था कि हिन्दुत्व एक जीवनशैली है न कि धर्म।
पिछले हफ्ते सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ ने याचिका दायर कर कहा था कि धर्म और राजनीति को जोड़ना नहीं चाहिए और इस दिशा में राजनीति से धर्म को अलग रखने का प्रावधान किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता ने हिंदुत्व की पुनर्व्याख्या की भी मांग की थी।
इसी से जुड़े चुनावी भ्रष्टाचार मामले की सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा कि 1995 के फैसले से संबंधित जो मसला हमारे समक्ष परीक्षण के लिए आया है, उसमें हिंदुत्व शब्द का उल्लेख नहीं है। अगर कोई यह बताए कि इसमें हिंदुत्व का जिक्र है तो वह इस मसले का परीक्षण करेंगे, लेकिन हमारे पास परीक्षण के लिए आए मामले में हिंदुत्व का जिक्र नहीं है। पीठ ने कहा कि फिलहाल वह उम्मीदवारों व धार्मिक नेताओं के बीच गठजोड़ और जन प्रतिनिधि कानून की धारा-123 केतहत कानूनी वैधता का परीक्षण कर रही है और इसी तक ही सीमित रहना चाहती है।