सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया पर चिंता जताई। उन्होंने मतदाता सूची से हटाए गए व्यक्तियों द्वारा दायर अपीलों पर विचार करने के लिए एक मजबूत अपीलीय तंत्र की आवश्यकता पर जोर दिया।
न्यायमूर्ति बागची ने विशेष रूप से इस बात पर प्रकाश डाला कि पश्चिम बंगाल के मामले में चुनाव आयोग ने अन्य राज्यों की प्रक्रिया से अलग 'तार्किक विसंगति' (लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी) नामक एक नई श्रेणी पेश की। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार एसआईआर मामले में लिए गए रुख से भी चुनाव आयोग भटक गया। इसमें कहा गया था कि 2002 की मतदाता सूची में शामिल व्यक्तियों को दस्तावेजों को अपलोड करने की आवश्यकता नहीं होगी।
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न्यायमूर्ति बागची ने चुनाव आयोग से पूछे सवाल
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक न्यायमूर्ति बागची ने चुनाव आयोग से कहा, "अगर 10% मतदाता मतदान नहीं करते हैं और जीत का अंतर 10% से अधिक है... तो क्या होगा? मान लीजिए कि अंतर 2% है और मतदान के लिए चिह्नित 15% मतदाता मतदान नहीं कर सके, तो शायद हमें इस पर निश्चित रूप से विचार करना होगा।''
उन्होंने साफ किया कि हम इस मामले पर कोई राय व्यक्त नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ''कृपया ध्यान रखें कि एक सतर्क मतदाता की चिंता, जिसका नाम सही या गलत तरीके से सूची में नहीं है, हमारे लिए मायने नहीं रखती है।"
SIR का काम देख रहे न्यायिक अधिकारियों पर भी की टिप्पणी
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि एसआईआर का कार्य कर रहे न्यायिक अधिकारियों से अत्यधिक दबाव वाली परिस्थितियों में 100% सटीकता की उम्मीद नहीं की जा सकती है। उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति कम समय सीमा के भीतर प्रतिदिन 1000 से अधिक दस्तावेजों से निपट रहा हो, तो 70% सटीकता को भी 'उत्कृष्ट' माना जाएगा। इसलिए, उन्होंने एक मजबूत अपीलीय तंत्र की आवश्यकता पर जोर दिया।
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हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने याचिका स्वीकार करने में अनिच्छा जताई। उन्होंने कहा कि हम इसे स्वीकार नहीं करेंगे। बेहतर है कि आप वहां (अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष) इसका पालन करें। पीठ ने यह याचिका खारिज कर दी, लेकिन याचिकाकर्ताओं के लिए अपील का उपाय खुला रखा। पीठ ने स्पष्ट किया कि अगर याचिकाकर्ताओं की अपीलें स्वीकार की जाती हैं, तो जरूरी निर्णय लिए जाएंगे।
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