कैंसर की दवाओं और अन्य औषधियों की कीमतों में भारी मुनाफावसूली को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि दवाओं की एमआरपी (न्यूनतम खुदरा मूल्य), खुदरा मूल्य (रिटेल प्राइस) पर अधिकतम 16 प्रतिशत तक सीमित होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें दवाओं की कीमतों का नियमन करने, जेनरिक दवाओं के इस्तेमाल और मेडिकल उपकरणों को ड्रग्स मूल्य नियंत्रण आदेश (डीपीसीओ) कानून, 2023 को लेकर चिंता जताई गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कीमतों को रिटेल प्राइस के 16 प्रतिशत तक ही सीमित करने का सुझाव दिया। जस्टिस मेहता ने कहा कि कैंसर की एक दवा का खुदरा मूल्य तीन हजार रुपये है, लेकिन उसी दवा की एमआरपी 27 हजार रुपये है। उन्होंने कहा कि यह बहुत बड़ा अंतर है। सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं पर मुनाफाखोरी को लेकर गहरी चिंता जाहिर की।
सुप्रीम कोर्ट ने डीपीसीओ के तहत जरूरी और गैर जरूरी दवाओं को लेकर भी सवाल उठाए। याचिका में कहा गया कि कॉरपोरेट अस्पताल अक्सर सरकारी योजनाओं के तहत इलाज कराने वाले मरीजों को इन-हाउस फार्मेसी से दवाएं खरीदने के लिए कहते हैं और ऊंची कीमत पर दवाएं खरीदने का बोझ अक्सर गरीब परिवारों पर पड़ता है, जो उन्हें अपनी जेब से चुकाना होता है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने क्या कहा?
केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस मुद्दे पर संतुलित रास्ता निकाला जाएगा। तुषार मेहता ने कहा कि मैं ये नहीं कह रहा कि याचिकाकर्ता सही या गलत हैं, लेकिन बीच का रास्ता निकालना होगा। जहां तक मेरी जानकारी है कि फार्मा कंपनियों को इससे फायदा नहीं हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट अब 12 अक्तूबर को इस मामले पर सुनवाई करेगा।
पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की दवाओं पर भारी मुनाफाखोरी को दिनदहाड़े डकैती करार दिया था। पीठ ने कहा था 'यह बिल्कुल चौंकाने वाली बात है कि जरूरी कैंसर की दवा का एमआरपी 27,000 रुपये है, जबकि रिटेलर को यह 2,700 रुपये में दी जा रही है। रिटेलर को दी जाने वाली कीमत से एमआरपी 10 गुना है।' कोर्ट ने कहा कि अगर यह जबरन वसूली नहीं है तो और क्या है?