सुप्रीम कोर्ट कल निर्वाचन आयोग (ईसीआई) की ओर से कराए गए मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर कल अपना फैसला सुनाएगा। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ यह फैसला सुनाएगी।
शीर्ष कोर्ट यह जांच कर रही है कि क्या चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 326, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और उससे जुड़े नियमों के तहत वर्तमान रूप में एसआईआर कराने का अधिकार है।
शीर्ष कोर्ट ने एसआईआर पर नहीं लगाई थी रोक
कोर्ट ने एसआईआर प्रक्रिया पर रोक नहीं लगाई थी और यह प्रक्रिया बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुदुचेरी और पश्चिम बंगाल में पूरी हो चुकी है। उत्तर प्रदेश, गुजरात और राजस्थान जैसे कई राज्यों में यह अभी जारी है। कोर्ट ने प्रक्रिया जारी रहने दी। लेकिन कहा कि वह यह तय करेगी कि निर्वाचन आयोग को ऐसा करने का कानूनी अधिकार है या नहीं। इस मामले में 29 जनवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया गया था।
पिछले साल जून में दायर की गईं अधिकांश याचिकाएं
ज्यादातर याचिकाएं पिछले साल जून में दायर की गई थीं, जब निर्वाचन आयोग ने बिहार में एसआईआर कराने का फैसला लिया था। याचिकाकर्ताओं में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर), राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव, तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा, राजद सांसद मनोज झा, कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) सांसद सुप्रिया सुले समेत कई लोग शामिल हैं।
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आधार को लेकर शीर्ष कोर्ट ने क्या कहा था?
पिछले साल सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को आधार कार्ड को '12वें दस्तावेज' के रूप में स्वीकार करने का निर्देश दिया था, जिसे बिहार की संशोधित मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए पहचान पत्र के तौर पर पेश किया जा सकता है। हालांकि, कोर्ट ने साफ किया था कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं होगा और निर्वाचन आयोग के अधिकारी आधार कार्ड की सत्यता की जांच कर सकेंगे।