सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवाद और बच्चे की कस्टडी से जुड़े मामलों में पॉक्सो कानून के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए कई सुरक्षा उपाय तय किए हैं। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि ये उपाय उन मामलों में लागू होंगे, जहां बच्चे के माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद चल रहा हो और बच्चे के साथ रहने वाले किसी माता-पिता या परिवार के सदस्य पर पॉक्सो के तहत यौन अपराध का आरोप लगा हो।
शीर्ष अदालत ने साफ किया कि इन उपायों का मतलब पॉक्सो कानून को कमजोर करना नहीं है। यह कानून बच्चों को यौन हमला, यौन उत्पीड़न और यौन शोषण से बचाने के लिए बनाया गया है। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में बच्चे की सुरक्षा और आरोपी को होने वाले गंभीर नुकसान, दोनों के बीच संतुलन जरूरी है।
क्या पॉक्सो एफआईआर होते ही गिरफ्तारी हो जाएगी?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तय परिस्थितियों में एफआईआर दर्ज होने के बाद जांच अधिकारी को जल्दबाजी में आरोपी को गिरफ्तार नहीं करना चाहिए। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस की धारा 35 में गिरफ्तारी को लेकर जो नियम हैं, उनका सख्ती से पालन करना होगा।
पुलिस को शिकायत मिलते समय यह भी देखना होगा कि बच्चे के माता-पिता के बीच कोई वैवाहिक विवाद चल रहा है या नहीं। अगर मामला तय शर्तों के दायरे में आता है तो जांच अधिकारी को पहले पूरे मामले को समझना होगा। गिरफ्तारी तभी की जानी चाहिए, जब कानून के मुताबिक उसकी जरूरत हो और आरोपी के अपराध में शामिल होने का जरूरी आधार हो।
बच्चे की मनोवैज्ञानिक जांच क्यों होगी?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में जरूरत पड़ने पर बच्चे का मूल्यांकन बाल एवं किशोर मनोचिकित्सा या क्लिनिकल साइकोलॉजी के विशेषज्ञ से कराया जाएगा। जांच अधिकारी या विशेष किशोर पुलिस इकाई इस विशेषज्ञ की मदद लेगी। इसके लिए जिला बाल संरक्षण इकाई या उसके उपलब्ध न होने पर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण से सलाह ली जाएगी।
आमतौर पर विशेषज्ञ का चयन पॉक्सो नियम, 2020 के नियम 5 के तहत जिला बाल संरक्षण इकाई के रजिस्टर से किया जाएगा। अगर वहां उपयुक्त विशेषज्ञ नहीं है तो समान योग्यता वाले विशेषज्ञ को बाहर से भी लिया जा सकता है। हालांकि, अगर मामला बिल्कुल साफ है और सामग्री स्पष्ट है तो विशेषज्ञ की मदद नहीं लेने का फैसला किया जा सकता है। लेकिन ऐसी स्थिति में कारण लिखित रूप में दर्ज करना होगा।
बच्चे से पूछताछ में किन बातों का ध्यान रखना होगा?
कोर्ट ने कहा कि बच्चे का मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सकीय मूल्यांकन स्वतंत्र तरीके से होना चाहिए। उस पर माता-पिता या जांच अधिकारियों का कोई दबाव नहीं होना चाहिए। बच्चे को किसी तरह की परेशानी या बार-बार पूछताछ से भी बचाना होगा।
अगर बाल कल्याण समिति ने बच्चे के लिए सपोर्ट पर्सन नियुक्त किया है तो वह मूल्यांकन के दौरान उसके साथ रह सकता है। विशेषज्ञ अपनी रिपोर्ट जांच अधिकारी या विशेष किशोर पुलिस इकाई को देगा। हालांकि, जांच अधिकारी विशेषज्ञ की राय मानने के लिए बाध्य नहीं होगा। रिपोर्ट सिर्फ जांच में मदद करेगी और अकेले इसी के आधार पर चार्जशीट या क्लोजर रिपोर्ट दाखिल नहीं की जा सकती।
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कस्टडी विवाद में पॉक्सो केस दर्ज होने का क्या असर होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे की कस्टडी और अभिभावकत्व से जुड़े मामलों पर भी स्थिति साफ की है। अगर माता-पिता के बीच कस्टडी का विवाद चल रहा है और एक अभिभावक या उसके साथ रहने वाले परिवार के सदस्य पर पॉक्सो का आरोप लगता है, तो सिर्फ केस दर्ज होने को आरोप का सबूत नहीं माना जा सकता।
इसका मतलब यह भी है कि केवल पॉक्सो केस दर्ज होने के आधार पर किसी अभिभावक का कस्टडी या अभिभावकत्व का दावा अपने आप खत्म नहीं होगा। अदालत को जांच के दौरान सामने आए तथ्यों और दूसरे उपलब्ध सबूतों को देखकर हर मामले में प्रथमदृष्टया राय बनानी होगी कि आरोपों में आधार है या नहीं।
सीधे विशेष अदालत में शिकायत हो तो क्या होगा?
पॉक्सो की धारा 33 के तहत अगर कोई व्यक्ति सीधे विशेष अदालत में शिकायत करता है तो अदालत को सिर्फ शिकायत दाखिल होने के कारण तुरंत संज्ञान लेने की जरूरत नहीं है। पहले अदालत को यह देखना होगा कि अपराध होने के पर्याप्त आधार हैं या नहीं और प्रथमदृष्टया मामला बनता है या नहीं।
ऐसे मामलों में भी तय शर्तें पूरी होने पर अदालत बच्चे का बाल एवं किशोर मनोचिकित्सा या क्लिनिकल साइकोलॉजी विशेषज्ञ से मूल्यांकन करा सकती है। विशेषज्ञ की रिपोर्ट को दूसरे तथ्यों के साथ देखकर अदालत तय करेगी कि शिकायत पर आगे बढ़ने के पर्याप्त आधार हैं या नहीं।
शीर्ष अदालत ने कहा कि वैवाहिक विवादों में लगाए गए झूठे पॉक्सो आरोप किसी व्यक्ति की आजादी पर गंभीर असर डाल सकते हैं। इसका असर बच्चे की कस्टडी और अभिभावकत्व से जुड़े अलग मामलों पर भी पड़ सकता है। पॉक्सो की धारा 22 में कुछ परिस्थितियों में झूठी शिकायत या गलत जानकारी देने पर सजा का प्रावधान है, लेकिन तब तक काफी नुकसान हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इन सुरक्षा उपायों का इस्तेमाल वास्तविक पीड़ित बच्चों की सुरक्षा को कमजोर करने के लिए नहीं किया जा सकता। मकसद यह है कि जहां मामला वैवाहिक विवाद से जुड़ा हो, वहां कानून की सख्ती बनाए रखते हुए किसी आरोपी को बिना जरूरी आधार के होने वाले गंभीर नुकसान से भी बचाया जा सके।
जिस मामले में फैसला आया, उसमें क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई की विस्तृत जांच, गवाहों के बयान, सीसीटीवी फुटेज और बच्चे के मनोवैज्ञानिक एवं मनोचिकित्सकीय मूल्यांकन समेत उपलब्ध सामग्री पर विचार किया। इसके बाद अदालत ने पॉक्सो की कार्यवाही रद्द कर दी। कोर्ट ने माना कि इस मामले में कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इन सुरक्षा उपायों से जुड़े पुलिस वाले निर्देश उन मामलों में भी लागू होंगे, जिनकी जांच फैसले की तारीख तक चल रही थी। वहीं, निजी शिकायतों से जुड़े निर्देश उन मामलों में लागू होंगे, जिनमें अभी समन जारी नहीं हुआ था।