सुप्रीम कोर्ट ने कहा, कानून बनाना संसद की संप्रभुता है, हम इसमें दखल नहीं देंगे। इस टिप्पणी के साथ शीर्ष अदालत ने एक उम्मीदवार को दो विधानसभा या संसदीय क्षेत्र से एकसाथ चुनाव लड़ने से रोकने की मांग पर विचार करने से इन्कार कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने कहा, कई कारणों से उम्मीदवार विभिन्न सीटों से चुनाव लड़ सकते हैं। यह संसद की संप्रभुता के दायरे में आने वाली विधायी नीति का प्रश्न है। आखिर यह संसद की इच्छा है कि राजनीतिक लोकतंत्र को इस तरह का विकल्प देकर आगे बढ़ाया जाए या नहीं। उसे ही तय करने दिया जाए।
पीठ ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा-33(7) को असांविधानिक मनमाना या वोटरों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाला घोषित करने से इन्कार कर दिया। यह धारा उम्मीदवार को दो सीटों से चुनाव लड़ने की अनुमति देती है। वहीं, धारा-70 कहती है कि दोनों सीटों पर जीत दर्ज करने के बावजूद उम्मीदवार एक सीट ही अपने पास रख सकता है।
याचिकाकर्ता की दलील
अखिल भारतीय छवि दिखाने को नेता दो जगह से लड़ते हैं चुनाव
याचिकाकर्ता के वकील गोपाल शंकरनारायण : किसी राष्ट्रीय पार्टी का नेता अपनी अखिल भारतीय छवि दिखाने के इरादे से दो जगह से चुनाव लड़ जाता है। इन उम्मीदवारों से अधिक राशि जमा करवाई जानी चाहिए क्योंकि दोनों सीटों से जीतने पर उपचुनाव कराना होगा, जिससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
पीठ का जवाब
यह अनैतिकता नहीं... संसद को लगता है तो कानून संशोधित करे
पीठ : ऐतिहासिक शख्सियतों की लोकप्रियता देखते हुए इसमें अनैतिकता नजर नहीं आती। 1996 से पहले एक प्रत्याशी कितनी भी सीटों से चुनाव लड़ सकता था। 1996 में इस संख्या को दो करते हुए कानून में संशोधन किया गया था। अगर संसद को लगता है तो वह कानून में फिर संशोधन कर सकती है। न्यायिक हस्तक्षेप अनुचित है।
विधि आयोग की रिपोर्ट
दो जगह से चुनाव लड़ने से सरकारी खजाने पर बोझ
विधि आयोग ने एक रिपोर्ट में माना है कि दो सीटों से एक प्रत्याशी को अनुमति देना सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ है। वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की जनहित याचिका में इसी रिपोर्ट को आधार बनाया गया है। हालांकि पीठ ने कहा, यह एक नीतिगत मामला है और राजनीतिक लोकतंत्र का मुद्दा है। इस पर संसद को फैसला करना है।