सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने केवल इस आधार पर मुआवजा राशि को रद्द कर दिया था कि दावेदार यह साबित नहीं कर पाए थे कि दुर्घटना ट्रक के वजह से हुई थी। शीर्ष अदालत का फैसला पीड़ित के परिवार की ओर से दायर अपील पर आया है, जिन्होंने अगस्त 2023 में पारित हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सड़क हादसे में मारे गए व्यक्ति के परिजनों को 50.41 लाख रुपये का मुआवजा दिए जाने के खिलाफ दिए गए हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। मामले में जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने बुधवार को कहा कि इस फैसले के खिलाफ मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का आदेश समझ से परे था।
विज्ञापन
हाईकोर्ट ने मामले को नजरअंदाज कर दिया- सुप्रीम कोर्ट
पीठ ने कहा, हमें आश्चर्य है कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 173 के तहत दायर पहली अपील में, हाईकोर्ट ने मामले को नजरअंदाज कर दिया और एक संक्षिप्त आदेश के जरिये एमएसीटी के पारित विस्तृत फैसले को पलट दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि अधिनियम की धारा 173 के तहत हाईकोर्ट को से यह अपेक्षित था कि वह एमएसीटी के समक्ष प्रस्तुत मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण करता।
हाईकोर्ट ने किस वजह से रद्द की मुआवजे की राशि
पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने केवल इस आधार पर मुआवजा राशि को रद्द कर दिया था कि दावेदार यह साबित नहीं कर पाए थे कि दुर्घटना ट्रक के वजह से हुई थी। शीर्ष अदालत का फैसला पीड़ित के परिवार की ओर से दायर अपील पर आया है, जिन्होंने अगस्त 2023 में पारित हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। पीठ ने कहा कि चूंकि, मामला वर्ष 2018 का है और पहले ही 6 साल बीत चुके हैं, इसलिए और देरी पहले से ही तबाह परिवार की पीड़ा को और बढ़ा देगी।
विज्ञापन
हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी के पक्ष में सुनाया था फैसला
रिकॉर्ड में यह बात सामने आई कि पीड़ित मैहर तहसील में सहायक पोस्ट मास्टर के पद पर कार्यरत था। 18 जून, 2018 को जब वह गाड़ी से घर लौट रहा था, तभी एक तेज गति वाले ट्रक ने उसकी कार को टक्कर मार दी। दावेदारों ने कहा कि उसे रीढ़ की हड्डी टूटने के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन 28 जून, 2018 को उसकी मौत हो गई। एमएसीटी की ओर से पीड़ित के परिवार के सदस्यों को मुआवजा दिए जाने के बाद, बीमा कंपनी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की और तर्क दिया कि पीड़ित हादसे को गलत तरीके से क्लेम कर रहे हैं। हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए मुआवजे को रद्द कर दिया था। इस आदेश के खिलाफ पीड़ित परिवार ने शीर्ष अदालत का रुख किया था।