सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल लापरवाही के मामले पर फैसला सुनाते हुए कहा कि ‘रेस इप्सा लोकुटर’ के सिद्धांतों को लागू करने के लिए यह जरूरी है कि चिकित्सीय लापरवाही के आरोप को स्थापित करने के लिए ‘रेस’ मौजूद हो। अगर मरीजों को होने वाली जटिलताएं चिकित्सा प्रक्रिया से जुड़ी नहीं हैं तो लापरवाही का कोई मामला नहीं बनता है। ‘रेस इप्सा लोकुटर’ एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है ‘चीज स्वयं बोलती है’।
जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने एक महिला को राहत नहीं देने वाले उपभोक्ता आयोग के एक फैसले को बरकरार रखते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने आदेश में कहा कि ‘रेस इप्सा लोकुटर’ सिद्धांत वहां लागू होता है जहां परिस्थितियां यह संकेत करती हैं कि जिस पर आरोप लगा है उसने लापरवाही बरती है। इस सिद्धांत को साबित करने के लिए ठोस परिस्थितिजन्य या दस्तावेजी साक्ष्य होना बहुत जरूरी है।
आईसीयू में नहीं भेजा
अपीलकर्ता ने कहा कि उसके प्रति की मृत्यु दिल का दौरा पड़ने से हुई, जबकि उन्हें दिल से जुड़ी कोई समस्या नहीं थी। महिला के वकील ने बताया कि भर्ती के समय सूचित किया गया था कि सर्जरी के बाद उन्हें आईसीयू में स्थानांतरित किया जाएगा, लेकिन उन्हें रिकवरी रूम से सीधे एक निजी कमरे में स्थानांतरित कर दिया गया। अस्पताल के वकील ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि मरीज ने न्यूरोसर्जरी के बाद बहुत अच्छी रिकवरी की थी और पोस्टऑपरेटिव जटिलताएं नहीं थीं, इसलिए उसे रिकवरी रूम में स्थानांतरित कर दिया गया और उसके बाद एक निजी कमरे में ले जाया गया।
अस्पताल पर लगाया था आरोप
पीठ एक महिला याचिकाकर्ता की अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसके पति की हृदय गति रुकने से मृत्यु हो गई। महिला ने आरोप लगाया था कि अस्पताल ने उसके पति को प्राइवेट रूम में शिफ्ट करने से लेकर दिल का दौरा पड़ने तक उसकी उचित देखभाल नहीं की। राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निस्तारण आयोग ने तीन अगस्त 2010 के फैसले में महिला को कोई राहत देने से इन्कार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता इस बात का कोई कोई ठोस सबूत या सामग्री पेश करने में नाकाम रही कि उसके पति को ऑपरेशन से या किसी चिकित्सीय कमी के कारण दिल का दौरा पड़ा था। महिला ने उपभोक्ता आयोग के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।