सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के नए कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई टालने से साफ इनकार कर दिया है। बुधवार को शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार की उस दलील को ठुकरा दिया, जिसमें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अन्य व्यस्तताओं का हवाला देकर समय मांगा था। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि यह मामला देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
शीर्ष अदालत की सख्त टिप्पणी
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह फिलहाल सबरीमाला मंदिर से जुड़े नौ जजों की पीठ के सामने व्यस्त हैं। इस पर जस्टिस दत्ता ने कहा, 'यह मामला किसी भी अन्य विषय से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।' उन्होंने केंद्र को निर्देश दिया कि उनके सहयोगी वकील आज नोट्स लें, लेकिन सुनवाई नहीं रुकेगी।' कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को गुरुवार तक अपनी बहस पूरी करने का आदेश दिया है।
सीजेआई ने खुद को किया अलग
इससे पहले 20 मार्च को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस मामले से खुद को अलग कर लिया था। उन्होंने कहा था कि इस समिति में सीजेआई को रखने या हटाने का सवाल है, इसलिए वह हितों के टकराव के चलते इस बेंच का हिस्सा नहीं बनेंगे। वर्तमान में सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली बेंच कर रही है।
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क्या अदालत तय करेगी संसद का काम?
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक बेहद अहम संविधानिक सवाल उठाया है। शीर्ष अदालत ने पूछा कि क्या वह संसद को मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए कानून बनाने का निर्देश दे सकता है? जस्टिस दीपांकर दत्ता ने याचिका की उस मांग पर सवाल उठाया जिसमें संसद को कानून बनाने का निर्देश देने की बात कही गई है। उन्होंने पूछा कि क्या अदालत संसद को ऐसा आदेश दे सकती है और क्या यह मांग सुनवाई के योग्य है?
'अनूप बरनवाल' फैसले का हवाला
जस्टिस दत्ता ने दो मार्च 2023 के 'अनूप बरनवाल' मामले के फैसले का जिक्र किया। उस समय पांच जजों की बेंच ने कहा था कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, तब तक चयन समिति में पीएम, नेता प्रतिपक्ष और सीजेआई होंगे। अदालत ने आज टिप्पणी की कि वह फैसला केवल उस समय की रिक्तता को भरने के लिए था। जस्टिस दत्ता ने सवाल किया कि क्या अब बनाए गए कानून को भी उन्हीं पुरानी टिप्पणियों का पालन करना अनिवार्य है?
निष्पक्षता पर वकीलों की दलील
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने दलील दी कि 2023 का कानून सरकार को प्रधानता देता है। उन्होंने कहा कि समिति में पीएम और उनके द्वारा नामित मंत्री होने से यह 2-1 का अनुपात बन जाता है। उन्होंने कहा कि सरकार अपनी पसंद का व्यक्ति नियुक्त कर सकती है। वहीं, वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण ने तर्क दिया कि संविधान पीठ के सिद्धांतों को केवल संविधानिक संशोधन से बदला जा सकता है, साधारण कानून से नहीं। मामले की अगली सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी।
विवाद की जड़ क्या है?
विवाद दिसंबर 2023 में पारित उस कानून पर है, जिसने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया बदल दी है। मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि चयन समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश होने चाहिए। हालांकि, नए कानून में सीजेआई को हटाकर उनकी जगह प्रधानमंत्री की ओर से नामित एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया गया है। याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि इससे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी।
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