मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह (एक से अधिक विवाह) की प्रथा पर रोक लगाने की मांग अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। इस मामले में शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में बहुविवाह को असांविधानिक घोषित करने, सभी धर्मों के लिए द्विविवाह से जुड़े कानून को समान रूप से लागू करने और मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार की मांग की गई है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सामाजिक कार्यकर्ता जकिया सोमन और अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से जवाब तलब किया। अदालत ने फिलहाल मामले पर कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन केंद्र से उसका पक्ष मांगा है।
याचिका में क्या-क्या मांगें की गई हैं?
याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 82, जो द्विविवाह के लिए सजा का प्रावधान करती है, उसे किसी भी धार्मिक छूट के बिना सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू किया जाए।
इसके अलावा मुस्लिम विवाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण कराने, दूसरी शादी की स्थिति में पहली पत्नी और बच्चों को तत्काल कानूनी संरक्षण और भरण-पोषण देने तथा मुस्लिम पर्सनल लॉ को संविधान में निहित लैंगिक समानता के सिद्धांतों के अनुरूप संहिताबद्ध (कोडिफाई) करने की भी मांग की गई है।
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याचिका में किन आंकड़ों का हवाला दिया गया?
याचिका में सात राज्यों में कराए गए एक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि 88 प्रतिशत मामलों में पति दूसरी शादी से पहले पहली पत्नी की सहमति नहीं लेते। वहीं 79 प्रतिशत मामलों में पहली पत्नी को दूसरी शादी की जानकारी तक नहीं दी जाती। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ऐसी स्थिति महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा बढ़ाती है।
याचिका में कहा गया है कि कई मुस्लिम बहुल देशों ने भी समय के साथ बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाया है या उस पर कड़े कानूनी प्रतिबंध लगाए हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि बहुविवाह इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है और इसमें कानूनी सुधार संभव हैं।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल केवल केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। केंद्र का पक्ष आने के बाद अदालत तय करेगी कि इस मामले में आगे सुनवाई किस दिशा में होगी। इसलिए अभी बहुविवाह से जुड़े कानून में कोई बदलाव नहीं हुआ है। मामले का अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद ही होगा।