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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: सभी नफरती भाषणों की निगरानी हमारा काम नहीं; एक समुदाय के बहिष्कार से जुड़ा है मामला

Tue, 25 Nov 2025 10:38 PM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
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सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि वह देशभर में होने वाली हर नफरत भरे भाषण की न तो निगरानी करने का इरादा रखता है और न ही वह कानून बनाने के लिए बैठा है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि इसके लिए कानूनी प्रावधान, पुलिस तंत्र और हाईकोर्ट जैसी संस्थाएं मौजूद हैं।

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जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ एक आवेदन पर सुनवाई कर रही थी जिसमें एक विशेष समुदाय के सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार की कथित अपीलों का मुद्दा उठाया गया था। पीठ ने कहा कि हम इस याचिका के बहाने कानून नहीं बनाएंगे। न ही देश के किसी कोने में होने वाली हर छोटी घटना पर निगरानी रखने के लिए इच्छुक हैं। हाईकोर्ट हैं, पुलिस तंत्र है, संसद द्वारा बनाए कानून हैं, ये सभी पहले से मौजूद हैं। सुनवाई की शुरुआत में शीर्ष अदालत ने आवेदक को यह सलाह दी कि वह अपनी शिकायत लेकर संबंधित हाईकोर्ट जाए।

पीठ ने आवेदक से कहा, ’यह अदालत देशभर की हर घटना की निगरानी नहीं कर सकती। आप पहले अथॉरिटी के पास जाएं। अगर उनके द्वारा कार्रवाई नहीं की जाती है तब हाईकोर्ट जाएं।’ इस पर आवेदक के वकील ने कहा कि उन्होंने लंबित जनहित याचिका में एक आवेदन देकर आर्थिक बहिष्कार की नई घटनाओं को अदालत के संज्ञान में लाया है। पीठ ने पाया कि कुछ खास लोग ऐसे बयान दे रहे हैं। इस पर वकील ने कहा कि कुछ जन प्रतिनिधि भी ऐसे बयान दे रहे हैं।
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इस मौके पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सार्वजनिक हित सिर्फ एक धर्म तक सीमित नहीं हो सकता। उन्होंने कहा, ’सभी धर्मों में गंभीर स्तर पर नफरत भरी भाषणबाजी चल रही है। मैं ऐसे सभी उदाहरण उपलब्ध करा दूंगा। फिर आवेदक इन्हें भी जोड़कर समग्र रूप से मामला उठाएं।’ आवेदक के वकील ने कहा कि वे अदालत इसलिए आए हैं क्योंकि अथॉरिटी कार्रवाई नहीं कर रही है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेशों का हवाला दिया जिनमें ये कहा गया था कि यदि राज्य कार्रवाई न करे तो पुलिस को स्वत: संज्ञान लेना चाहिए, अन्यथा उनके खिलाफ अवमानना होगी। उन्होंने कहा कि सॉलिसिटर जनरल इसे राज्यों के संज्ञान में ला सकते हैं ताकि नफरती भाषणों पर सही कार्रवाई की जा सके।

मेहता ने कहा कि कोई भी नफरती भाषण में शामिल नहीं हो सकता। यह मेरा पक्ष है। लेकिन शिकायत करते समय कोई भी सार्वजनिक हित के लिए काम करने वाला व्यक्ति चुनिंदा तरीके से ऐसा नहीं कर सकता। पीठ ने दोहराया कि कानून में पर्याप्त तंत्र है और शिकायतकर्ता को उसका उपयोग करना चाहिए। अदालत ने कहा कि जिस राज्य में समस्या हो, वहां के हाईकोर्ट में जान चाहिए। हाईकोर्ट सार्वजनिक हित के मामलों का संज्ञान लेने में सक्षम है।

आवेदक ने 2022 के सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का भी उल्लेख किया जिसमें तीन राज्यों को नफरत फैलाने वाले भाषणों पर सख्त कार्रवाई करने के लिए कहा गया था। उन्होंने असम के एक मंत्री के बयान की ओर भी इशारा किया, जिसके बारे में उनका कहना था कि उसमें 1989 के भागलपुर दंगों का सांकेतिक उल्लेख था। पीठ ने कहा कि इन सभी मुद्दों पर 9 दिसंबर को सुनवाई की जाएगी।

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